Tuesday, June 26, 2012

ग़ैर मर्द के साथ रात में

उस दिन रविवार था। सारे दिन घर पर ही रहा। पहले दिन जो बाज़ार से ब्लू-फिल्मों की ४-५ सीडी लाया था उन्हें कम्प्यूटर में कॉपी किया था। एक-दो फ़िल्में देखी भी, पर मिक्की की याद आते ही मैंने कम्प्यूटर बन्द कर दिया। दिन में गर्मी इतनी ज्यादा कि आग ही बरस रही थी। रात के कोई १० बजे होंगे। अचानक मौसम बदला और ज़ोरों की आँधी के साथ हल्की बारिश शुरु हो गई। हवा के एक ठंडे झोंके ने मुझे जैसे सहला सा दिया। अचानक कॉलबेल बजी और लगभग दरवाज़ा पीटते हुए कोई बोला, "दीदीऽऽऽ !! ... जीजूऽऽऽ.. !! दरवाज़ा जल्दी खोलो... दीदी...!!!?" किसी लड़की की आवाज थी।
मिक्की जैसी आवाज़ सुनकर मैं जैसे अपने ख़्यालों से जागा। इस समय कौन आ सकता है? मैंने रुमाल और पैन्टी अपनी जेब में डाली और जैसे ही दरवाज़े की ओर बढ़ा, एक झटके के साथ दरवाज़ा खुला और कोई मुझ से ज़ोर से टकराया। शायद चिटकनी खुली ही रह गई थी, दरवाज़ा पीटने और ज़ोर लगाने के कारण अपने-आप खुल गया और हड़बड़ाहट में वो मुझसे टकरा गई। अगर मैंने उसे बाँहों में नहीं थाम लिया होता तो निश्चित ही नीचे गिर पड़ती। इस आपा-धापी में उसके कंधे से लटका बैग (लैपटॉप वाला) नीचे ही गिर गया। वो चीखती हुई मुझसे ज़ोर से लिपट सी गई। उसके बदन से आती पसीने, बारिश और जवान जिस्म की खुशबू से मेरा तन-मन सब सराबोर होता चला गया। उसके छोटे-छोटे उरोज मेरे सीने से सटे हुए थे। वो रोए जा रही थी। मैं हक्का-बक्का रह गया, कुछ समझ ही नहीं पाया।
कोई २-३ मिनटों के बाद मेरे मुँह से निकला "क्क..कौन... अरे.. नन्न्नन.. नि.. निशा तू...??? क्या बात है... अरे क्या हुआ... तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?" ओह ये तो मधु की कज़िन निशा थी। कभी-कभार अपने नौकरी के सिलसिले में यहाँ आया करती थी, और रात को यहाँ ठहर जाती थी। पहले मैंने इस चिड़िया पर ध्यान ही नहीं दिया था।

आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि इतनी मस्त-हसीन लौण्डिया की ओर मेरा ध्यान पहले क्यों नहीं गया। इसके दो कारण थे। एक तो वो सर्दियों में एक-दो बार जब आई थी तो वह कपड़ों से लदी-फदी थी, दूसरे उसकी आँखें पर मोटा सा चश्मा। आज तो वह कमाल की लग रही थी। उसने कॉन्टैक्ट लेंस लगवा लिए थे। कंधों के ऊपर तक बाल कटे हुए थे। कानों में सोने की पतली बालियाँ। जीन्स पैन्ट में कसे नितम्ब और खुले टॉप से झलकते काँधारी अनार तो क़हर ही ढा रहे थे। साली अपने-आप को झाँसी की शेरनी कहती है पर लगती है नैनीताल या अल्मोड़ा की पहाड़ी बिल्ली।

ओह... सॉरी जीजू... मधु दीदी कहाँ हैं?... दीदी... दीदी..." निशा मुझ से परे हटते हुए इधर-उधर देखते हुए बोली।

"ओह दीदी को छोड़ो, पहले यह बताओ तुम इतनी रात गए बारिश में डरी हुई... क्या बात है??"

"वो... वो एक कुत्ता..."

"हाँ-हाँ, क्या हुआ? तुम ठीक हो?"

निशा अभी भी डरी हुई खड़ी थी। उसके मुँह से कुछ नहीं निकल रहा था। मैंने दरवाज़ा बन्द किया और उसका हाथ पकड़ कर सोफ़े पर बिठाया, फिर पूछा, "क्या बात है, तुम रो क्यों रही थीं?"

जब उसकी साँसें कुछ सामान्य हुई तो वह बोली, "दरअसल सारी मुसीबत आज ही आनी थी। पहले तो प्रेज़ेन्टेशन में ही देर हो गई थी, और फिर खाना खाने के चक्कर में ९ बज गए। कार भी आज ही ख़राब होनी थी। बस-स्टैण्ड गई तो आगरा की बस भी छूट गई।" शायद इन दिनों उसकी पोस्टिंग आगरा में थी।

मैं इतना तो जानता था कि वह किसी दवा बनाने वाली कम्पनी में काम करती है और मार्केटिंग के सिलसिले में कई जगह आती-जाती रहती है। पर इस तरह डरे हुए, रोते हुए हड़बड़ा कर आने का कारण मेरी समझ में नहीं आया। मैंने सवालिया निगाहों से उसे देखा तो उसने बताया।

"वास्तव में महाराजा होटल में हमारी कम्पनी का एक प्रेज़ेन्टेशन था। सारे मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव आए हुए थे। हमारे दो नये उत्पाद भी लाँच किए गए थे। कॉन्फ्रेन्स ९ बजे खत्म हुई और खाना खाने के चक्कर में देर हो गई। वापस घर जाने का साधन नहीं था। यहाँ आते समय रास्ते में ऑटो ख़राब हो गई। इस बारिश को भी आज ही आना था। रास्ते में आपके घर के सामने कुत्ता सोया था। बेख्याली में मेरा पैर उसके ऊपर पड़ गया और वह इतनी ज़ोर से भौंका कि मैं डर ही गई।" एक साँस में निशा ने सब बता दिया।

"अरे कहीं काट तो नहीं लिया?"

"नहीं काटा तो नहीं...! दीदी दिखाई नहीं दे रही?"

"ओह... मधु तो जयपुर गई हुई है, पिछले १० दिनों से !"

"तभी उनका मोबाईल नहीं मिल रहा था।"

"तो मुझे ही कर लिया होता।"

"मेरे पास आपका नम्बर नहीं था।"

"हाँ भई, आप हमारा नम्बर क्यों रखेंगी... हम आपके हैं ही कौन?"

"आप ऐसा क्यों कहते हैं?"

"भई तुम तो दीदी के लिए ही आती हो हमें कौन पूछता है?"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।"

"इसका मतलब तुम मेरे लिए भी आती हो।" मैं भला मज़ाक का ऐसा सुनहरा अवसर कैसे छोड़ता। वो शरमा गई। उसने अपनी निगाहें नीची कर लीं। थोड़ी देर कुछ सोचती रही, फिर बोली, "ओह, दीदी तो है नहीं तो मैं किसी होटल में ही ठहर जाती हूँ!"

"क्यों, यहाँ कोई दिक्क़त है?"

"वो... वो... आप अकेले हैं और मैं... मेरा मतलब... दीदी को पता चलेगा तो क्या सोचेगी?"

"क्यों क्या सोचेगी, क्या तुम इससे पहले यहाँ नहीं ठहरी?"

"हाँ पर उस समय दीदी घर थी।"

"क्या हम इतने बुरे हैं?"

"ओह.. वो बात नहीं है।"

"तो फिर क्या बात है?"

"वो.. .वो... मेरा मतलब क्या है कि एक जवान लड़की का इस तरह ग़ैर मर्द के साथ रात में... अकेले?? मेरा मतलब?? वो कुछ समझ नहीं आ रहा।" उसने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा।

"ओह.. अब मैं समझा, तुम मुझे ग़ैर समझती हो या फिर तुम्हें अपने आप पर ही विश्वास नहीं है।"

"नहीं ऐसी बात तो नहीं है।"

"तो फिर बात यह है कि मैं एक हिंसक पशु हूँ, एक गुंडा-बदमाश, मवाली हूँ। तुम जैसी अकेली लड़की को पकड़कर तुम्हें खा ही जाऊँगा या कुछ उल्टा-सीधा कर बैठूँगा? क्यों है ना यही बात?"............................................:

"ओह जीजू, आप भी बात का बतंगड़ बना रहे हैं। मैं तो यह कह रही थी आपको बेकार परेशानी होगी।"

"अरे इसमे परेशानी वाली क्या बात है?"

"फिर भी एकता कपूर... मेरा मतलब वो... दीदी...?" वो कुछ सोचते हुए सी बोली।

"अरे जब तुम्हें कोई समस्या नहीं है, मुझे नहीं, तो फिर जयपुर बैठी मधु को क्या समस्या हो सकती है। और फिर आस-पड़ोस वाले किसी से कोई फिक्र नहीं करते हैं। अगर अपना मन साफ़ है तो फ़िर किसी का क्या डर? क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?" मैंने कहा। मैं इतना बढ़िया मौक़ा और हाथ में आई मुर्गी को ऐसे ही हवा में कैसे उड़ जाने देता।

मुझे तो लगा जैसे मिक्की ही मेरे पास सोफ़े पर बैठी है। वही नाक-नक्श, वही रूप-रंग और कद-काठी, वही आवाज़, वही नाज़ुक सा बदन, बिल्कुल छुईमुई सी कच्ची-कली जैसी। बस दोनों में फ़र्क इतना था कि निशा की आँखें काली हैं और मिक्की की बिल्लौरी थीं। दूसरा निशा कोई २४-२५ की होगी जबकि मिक्की १३ की थी। मिक्की थोड़ी सी गदराई हुई लगती थी जबकि निशा दुबली-पतली छरहरी लगती है। कमर तो ऐसी कि दोनों मुट्ठियों में ही समा जाए. छोटे-छोटे रसकूप (उरोज)। होंठ इतने सुर्ख लाल, मोटे-मोटे हैं तो उसके निचले होंठ मेरा मतलब है कि उसकी बुर के होंठ कैसे होंगे। मैं तो सोच कर ही रोमांचित हो उठा। मेरा पप्पू तो छलांगे ही लगाने लगा। उसके होठों के दाहाने (चौड़ाई) तो २.५-३ इंच का ही होगा। हे लिंग महादेव, अगर आज यह चिड़िया फँस गई तो मेरी तो लॉटरी ही लग जाएगी। और अगर ऐसा हो गया तो कल सोमवार को मैं ज़रूर जल और दूध तुम्हें चढ़ाऊँगा। भले ही मुझे कल छुट्टी ही क्यों ना लेनी पड़े। पक्का वादा।

प्रेम आश्रम वाले गुरुजी ने अपने पिछले विशेष प्रवचन में सच ही फ़रमाया था, "ये सब चूतें, गाँड और लंड कामदेव के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। कौन सी चूत और गाँड किस लण्ड से, कब, कहाँ, कैसे, कितनी देर चुदेंगी, कोई नहीं जानता।"
"इतने में ज़ोरों की बिजली कड़की और मूसलाधार बारिश शुरु हो गई। निशा डर के मारे मेरी ओर सरक गई। मुझे एक शेर याद आ गया:

लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से !
या इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे !!

उसके भींगे बदन की खुशबू से मैं तो मदहोश ही हुआ जा रहा था। गीले कपड़ों में उसका अंग-अंग साफ दिख़ रहा था। शायद उसने मुझे घूरते हुए देख लिया था। वो कुछ सोचते हुए बोली, "मैं तो पूरी ही भीग गई।"

"मैं समझ गया, वो कपड़े बदलना या नहाना चाहती है, पर उसके पास कपड़े नहीं हैं, मेरे से कपड़े माँगते हुए शायद कुछ संकोच कर रही है। मैंने उससे कहा, "कोई बात नहीं, तुम नहा लो, मैं मधु की साड़ी निकाल देता हूँ।"
वो फिर सोचने लगी, "पर वो... वो... साड़ी तो मुझे बाँधनी नहीं आती। मैंने मन में कहा, "मेरी जान तुम तो बिना साड़ी-कपड़ों के ही अच्छी लगोगी। तुम्हें कपड़े कौन कमबख़्त पहनाना चाहता है" पर मैंने कहा -

"कोई बात नहीं, कोई पैन्ट और टॉप शर्ट या नाईटी वगैरह भी है, आओ मेरे साथ।" मैंने उसकी बाँह पकड़ी और अपने बेडरूम की ओर ले जाने लगा। आहहह... उसकी नरम नाज़ुक बाँहें मखमल जैसी मुलायम चिकनी थीं। अगर बाँहें ऐसी चिकनी हैं तो पिर जाँघें कैसी होंगी?

कपड़ों की आलमारी तो साड़ियों से लदी पड़ी थी। एक खाने में कुछ पैन्ट-शर्ट और टॉप आदि भी थे। मैंने उनकी ओर इशारा कर दिया। निशा ने कहा,"पर मेरी कमर तो २२ की है, मधु दीदी की पैन्ट मुझे ढीली रहेगी!"

ओह... अच्छा कोई बात नहीं, मेरे पास एक ड्रेस और है, तुम्हें पूरी आनी चाहिए, आओ मेरे साथ।" मैंने आलमारी बन्द कर दी और दूसरी अलमारी की ओर ले जाकर उसे गुलाबी रंग की एक नई बेल-बॉटम और हल्के रंग का टॉप जिस पर पीले फूल बने थे, दिखाया, साथ एक जोड़ी ब्रा और पैन्टी भी थी। ये मैंने मिक्की के पिछले जन्मदिन के लिए मधु से छुपा कर ख़रीदे थे पर उसे दे नहीं पाया था। उन्हें देखकर निशा ने कहा, "लगता है ये तो आ जाएँगे।"

उसने पैन्टी उठाई और गौर से देखते हुए बोली, "ओह... दीदी भी ऐसी ही ब्रा पहनती हैं? ये.. तो ये.. तो ओह?" वो आगे कुछ नहीं बोल पाई। बे-खयाली में उसकसे मुँह से निकल तो गया पर उसका मतलब जान कर वो शरमा गई। इस्स्स्स्स.... मुझे तो लगा जैसे किसी ने मिक्की को ही मेरे सामने खड़ा कर दिया है बस नाम का ही फ़र्क है। मिक्की की तरह शरमाने की इस जानलेवा अदा को तो मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूल पाऊँगा।

न जाने क्या सोचकर उसने ब्रा और पैन्टी वहीं रख दी। मेरा दिल तो छलाँगें ही लगाने लगा। या अल्लाह... बिना ब्रा और पैन्टी में तो यह बिल्कुल मिक्की की तरह क़यामत ही लेगी। मैं अपने-आप पर क़ाबू कैसे रख पाऊँगा। मुझे तो डर लगने लगा कि कहीं मैं उसका बलात्कार ही ना कर बैठूँ। मेरा पप्पू तो जैसे क़ुतुबमीनार बन गया था। इतनी उत्तेजना तो आज से पहले कभी नहीं महसूस हुई थी। पप्पू तो अड़ियल टट्टू बन गया था। अचानक मेरे कानों में निशा की मीठी आवाज़ पड़ी।

"ओ जीजू, मैं नहाने जा रही हूँ।"

"हाँ-हाँ, तौलिया और शैम्पू आदि बाथरूम में हैं।" मैं तो जैसे ख़्यालों से जागा...

निशा बाथरूम में घुस गई। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। बाहर ज़ोरों की बारिश और मेरे अन्दर जलती आग, दोनों की रफ्तार एक जैसी ही तो थी। अचानक मेरे दिमाग़ में एक ख्याल दौड़ गया और होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान। और उसके साथ ही मेरे क़दम भी बाथरूम की ओर बढ़ गए। अब आप इतने कमअक्ल तो नहीं हैं कि आप मेरी योजना ना समझे हों।

मैंने की-होल से बाथरूम के अन्दर झाँका...

निशा ने अपनी पैन्ट और शर्ट उतार दी थी। अब वो सिर्फ ब्रा पैन्टी में थी। उफ्फ... क्या मस्त हिरनी जैसी गोरी-चिट्टी नाज़ुक कमसिन कली की तरह, जैसे मिक्की ही मेरी आँखों के सामने खड़ी हो। सुराहीदार गर्दन, पतली सी कमर मानों लिम्का की बोतल को एक जोड़ा हाथ और पैर लगा दिए हों। संगमरमर सा तराशा हुआ सफाक़ बदन किसी फरिश्ते का भी ईमान डोल जाए। एक ख़ास बात: काँख (जहाँ से बाँहें शुरु होतीं हैं) और उरोजों से थोड़ा ऊपर का भाग ऐसे बना था जैसे कि गोरी-चिट्टी चूत ही बनी है। ऐसी लड़कियाँ वाकई नाज़ुक होतीं हैं और उनकी असली चूत भी ऐसी ही होती है। छोटी सी तिकोने आकार की माचिस की डिब्बी जितनी बड़ी। अगर आपने प्रियंका चोपड़ा या करीना कपूर को किसी फिल्म में बिना बाँहों के ब्लाऊज़ के देखा हो तो आपको मेरी इस बात की सच्चाई का अन्दाज़ा हो जाएगा। फिर मेरा ध्यान उसकी कमर पर गया जो २२ इंच से ज्यादा तो हर्गिज़ नहीं हो सकती। पतली-पतली गोरी गुलाबी जाँघें। और दो इंच पट्टी वाली वही टी-आकार की पैन्टी (जो मधु की पसंदीदा है)। उनके बाहर झाँटों के छोटे-छोटे मुलायम रोयें जैसे बाल। हे भगवान, मैं तो जैसे पागल ही हो जाउँगा। मुझे तो लगने लगा कि मैं अभी बाथरूम का दरवाजा तोड़कर अन्दर घुस जाऊँगा और... और...

निशा ने बड़े नाज़-ओ-अन्दाज़ से अपनी ब्रा के हुक़ खोले और दोनों क़बूतर जैसे आज़ाद हो गए। गोर गुलाबी दो सिन्दूरी आम, जैसे रस से भरे हुए हों। चूचियों का गहरा घेरा कैरम की गोटी जितना बड़ा, बिल्कुल चुरूट लाल। घुण्डियाँ तो बस चने के दाने जितने। सुर्ख रतनार अनार के दाने जैसे, पेन्सिल की नोक की तरह तीखे। उसने अदा से अपने उरोजों पर हाथ फेरा और एक दाने को पकड़ कर मुँह की तरफ किया और उस पर जीभ लगा दी। या अल्लाह... मुझे लगा जैसे अब क़यामत ही आ जाएगी। उसने शीशे के सामने घुम कर अपने नितम्ब देखे। जैसे दो पूनम के चाँद किसी ने बाँध दिए हों। और उनके बीच की दरार एक लम्बी खाई की तरह। पैन्टी उस दरार में घुसी हुई थी। उसने अपने नितम्बों पर एक हल्की सी चपत लगाई और फिर दोनों हाथों को कमर की ओर ले जाकर अपनी काली पैन्टी नीचे सरकानी शुरु कर दी।

मुझे लगा कि अगर मैंने अपनी निगाहें वहाँ से नहीं हटाईं तो आज ज़रूर मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। जैसे ही पैन्टी नीचे सरकी हल्के-हल्के मक्के के भुट्टे के बालों जैसे रेशमी नरम छोटे-छोटे रोयें जैसे बाल नज़र आने लगे। उसके बाद दो भागों में बँटे मोटे-मोटे बाहरी होंठ, गुलाबी रंगत लिए हुए। चीरा तो मेरे अंदाज के मुताबिक ३ इंच से तो कतई ज़्यादा नहीं था। अन्दर के होंठ बादामी रंग के। लगता है साली ने अभी तक चूत (माफ़ करें बुर) से सिर्फ मूतने का ही काम लिया है। कोई अंगुल बाज़ी भी लगता है नहीं की होगी। अन्दर के होंठ बिल्कुल चिपके हुए - आलिंगनबद्ध। और किशमिश का दाना तो बस मोती की तरह चमक रहा था। गाँड की छेद तो नज़र नहीं आई पर मेरा अंदाजा है कि वो भी भूरे रंग का ही होगा और एक चवन्नी के सिक्के से अधिक बड़ा क्या होगा! दाईं जाँघ पर एक छोटा सा तिल। उफ्फ... क़यामत बरपाता हुआ। उसने शीशे में देखते हुए उन रेशमी बालों वाली बुर पर एक हाथ फेरा और हल्की सी सीटी बजाते हुए एक आँख दबा दी। मेरा पप्पू तो ऐसे अकड़ गया जैसे किसी जनरल को देख सिपाही सावधान हो जाता है। मुझे तो डर लगने लगा कि कहीं ये बिना लड़े ही शहीद न हो जाए। मैंने प्यार से उसे सहलाया पर वह मेरा कहा क्यों मानने लगा।

और फिर नज़ाक़त से वो हल्के-हल्के पाँव बढ़ाते हुए शावर की ओर बढ़ गई। पानी की फुहार उसके गोरे बदन पर पेट से होती हुई उसकी बुर के छोटे-छोटे बालों से होती हुई नीचे गिर रही थी, जैसे वो पेशाब कर रही हो। मैं तो मुँह बाए देखता ही रह गया।

वो गाती जा रही थी "पानी में जले मेरा गोरा बदन..." मैं सोच रहा था आज इसे ठण्डा मैं कर ही दूँगा, घबराओ मत। कोई १० मिनट तक वो फव्वारे के नीचे खड़ी रही, फिर उसने अपनी बुर को पानी से धोया। उसने अपनी उँगलियों से अपनी फाँकें धीरे से चौड़ी कीं जैसे किसी तितली ने अपने पंख उठाए हों। गुलाबी रंग की नाज़ुक सी पंखुड़ियाँ। किशमिश के दाने जितनी मदन-मणि (टींट), माचिस की तीली जितना मूत्र-छेद और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग का द्वार, छोटा सा लाल रतनार। मुझे लगा कि मैं तो गश खाकर गिर ही पड़ूँगा।

उसने शावर बन्द कर दिया और तौलिये से शरीर पोंछने लगी। जब वह अपने नितम्ब पोंछ रही थी, एक हल्की सी झलक उसकी नर्म नाज़ुक गाँड की छेद पर भी पड़ ही गई। उफ्फ... क्या क़यामत छुपा रखी थी उसने। अपनी बगलें पोंछने के लिए जब उसने अपनी बाहें उठाईं तो मैं देखकर दंग रह गया। काँख में एक भी बाल नहीं, बिल्कुल मक्खन जैसी चिकनी साफ सुराही गोरी चिट्टी। अब मैं उसे हुस्न कहूँ, बिजली कहूँ, पटाखा कहूँ या क़यामत...

अरश मलशियानी का एक शेर तो कहे बिना नहीं रहा जा रहा:

बला है क़हर है आफ़त है फितना है क़यामत है

इन हसीनों की जवानी को जवानी कौन कहता है?

अब उसने बिना ब्रा और पैन्टी के ही शर्ट (टॉप) और बॉटम पहनना चालू कर दिया। बेल बॉटम पहनते समय मैंने एक बार फिर उसकी चूत पर नज़र डाली। लाल चुकन्दर जितनी छोटी सी, प्यारी सी चूत जैसे मिक्की का ही डबल रोल हो। अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। हे भोले शंकर आज मेरी लाज रख लेना कल सोमवार है याद है ना???...

मैं सोफ़े पर बैठ गया। जैसी ही बाथरूम का दरवाज़ा खुला गीले बालों से टपकती शबनम जैसी बूँदे, काँपते होंठ, क़मसिन बदन, बेल-बॉटम में कसी पतली-पतली जाँघों के बीच फँसी बुर का इतिहास और भूगोल यानी चीरा और फाँकें साफ़ महसूस हो रही थी। हे भगवान क्या फुलझड़ी है, पटाखा है, या कोई बम है। एक जादुई रोशनी से जैसे पूरा ड्राईंग-रूम ही भर उठा। अचानक एक बार जोर की बिजली कड़की और एक तेज धमाके के साथ पूरे मुहल्ले की लाईट चली गई। हॉल में घुप्प अँधेरा छा गया। उसके साथ ही डर के मार निशा की चीख सी निकल गई, "जीजू, ये क्या हुआ?" वो लगभग दौड़ती हुई फिर मेरी ओर आई। इस बार वह टकराई तो नहीं पर उसकी गरम साँसें मैं अपने पास ज़रूर महसूस कर रहा था।

"लगता है कहीं शॉर्ट-सर्किट हो गया है। तुम डरो मत, यहीं ठहरो, मैं इन्वर्टर चालू करता हूँ।" मैंने दरवाज़े के पास लगा इन्वर्टर चालू किया तो हमारे बेडरूम और स्टडी-रूम की बत्ती जल उठी।

"हे भगवान सब कुछ उल्टा-सीधा आज ही होना है क्या?" निशा रूआँसे स्वर में बोली।

"क्यों क्या हुआ?"

"अब देखो ना लाईट भी चली गई।" उसने एक ठंडी साँस ली।

"पर बेडरूम में तो लाईट है ना।"

"पर मुझे तो कल के वर्कशॉप में प्रेज़ेन्टेशन के लिए प्रोजेक्ट-वर्क तैयार करना था और मेरे लैपटॉप को भी आज ही ख़राब होना था। हे भगवान..."

"कोई बात नहीं तुम स्टडी-रूम में रखे कम्प्यूटर से काम चला सकती हो।" मैंने पूछा "कितना काम है?"

"घंटा भर तो लग ही जाएगा। अच्छी मुसीबत है। मैं भी कहाँ फँस गई इस कम्पनी में।"

"क्यों क्या हुआ?"

"अब देखो ना रोज़-रोज़ का प्रेज़ेन्टेशन, मीटिंग्स, वर्कशॉप, एनालिसिस, प्रोडक्ट लाँचिंग - झमेले ही झमेले हैं इस नन्हीं सी जान पर।"

मैंने अपने मन मे कहा, 'मेरी जान हम जैसे किसी आशिक़ का दामन थाम लो, सारे प्रोजेक्ट कर दूँगा' पर मैंने कहा "कौन सा उत्पाद लाँच कर रही हो?"

"दो उत्पाद हैं, एक तो गर्भाधान रोकने की गोली है, महीने में सिर्फ एक गोली और दूसरा बच्चों के अँगूठा चूसने और दाँतों से नाख़ून काटने की आदत से छुटकारा दिलाने की दवाई है, जिसे नाखूनों पर लगाया जाता है।"

"हे भगवान तुम सब लोग हमारी रोज़ी-रोटी छीन लेने पर तुले हो।"

"क्या मतलब?? हम तो बिज़नेस के साथ-साथ समाज सेवा भी कर रहे हैं।" निशा ने हैरानी से पूछा वो बात-बात में 'क्या मतलब' ज़रूर बोलती है।
"अरे भाई साफ़ बात है, तुम गर्भधारण रोकने की दवा की मार्केटिंग करती हो तो बच्चे कहाँ से पैदा होंगे और फिर हमारे उत्पाद जैसे बच्चों का दूध, बच्चों का आहार, बच्चों के तेल, नैप्पी, पावडर, साबुन कौन खरीदेगा?"

"और वो अँगूठा चूसने की आदत छुड़ाने की दवाई?"

"वो भी हम जैसे प्रेमियों के ऊपर उत्याचार ही है।"

"क्या... मत...लब?" निशा मेरा मुँह देखने लगी।

"शादी के बाद वो आदत अपने-आप छूट जाती है... उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती। शादी के बाद भला कौन उसे अँगूठा चूसने देता है..." मैंने हँसते हुए कहा।

पहले तो मेरी बात उसे समझ ही नहीं आई, लेकिन बाद में तो वो इतने ज़ोर से शरमाई कि पूछो मत। उसने मुझे एक धक्का सा देते हुए कहा "जीजू तुम एक नम्बर के बदमाश हो।"

"नहीं, मैं दो नम्बर का बदमाश हूँ।" मैं खिलखिला कर हँस पड़ा

"जीजू मज़ाक छोड़ो, मुझे अपना प्रोजेक्ट पूरा करना है। कम्प्यूटर कहाँ है?"

"हाँ चलो मुझे भी अपना प्रोजेक्ट बनाना है।"

"अरे आपको कौन सा प्रोजेक्ट बनाना है?"

"अरे तुम नहीं जानती, मुझे एक नहीं पूरे ५ प्रोजेक्ट्स पर काम करना है" अब मैं उसे क्या बताता कि 'मुझे तुम्हारा दूध पीना है, बुर चाटनी है, अपना लंड चुसवाना है, चुदाई करनी है, और गाँड भी मारनी है।' हो गए ना पूरे ५ प्रोजेक्ट्स।

"ओह... पर आपके लिए तो ये मामूली सी बात है आप तो बड़े अनुभवी हैं आप तो झट से कार्यक्रम बना ही लेंगे।" वो भले मेरे इन नए उत्पादों के बारे में अभी क्या जानती थी।

"हाँ वो तो ठीक है पर मेरे पास भी समय कम बचा है, केवल २ घंटे और पूरे ५ प्रोजेक्ट्स... ख़ैर छोड़ो पूरा तो कर ही लूँगा। मुझे अपने-आप पर पूरा भरोसा है। आओ स्टडी-रूम में तुम्हें कम्प्यूटर दिखा दूँ।" और फिर हम दोनों स्टडी-रूम में आ गए।

कम्प्यूटर चाली करने के बाद उसने पेन-ड्राईव निकाली और उसे कम्प्यूटर में नीचे बने छेद में डालने की कोशिश की पर वह अन्दर नहीं गया।

"जीजू ये इस छेद में अन्दर क्यों नहीं जा रहा?"

"अरे पीछे वाली छेद में डालो, उसमें आराम से चला जाएगा।" उसने मेरी ओर थोड़े गुस्से से देखा तो मैंने कहा, "अरे भाई ये छेद ख़राब है, इसके पीछे और छेद हैं, उसमें... वो सही है तुम मज़ाक समझ रही हो।" मैंने हँसते हुए कहा।

"आप मेरा लैपटॉप ठीक कर दो ना प्लीज़" मेरी बात काटते हुए निशा बोली।

"लाओ मैं देख देता हूँ, क्या समस्या है।" मैं लैपटॉप लेकर अपने बेडरूम में आ गया। बेडरूम में पहुँच कर मैंने अपने प्रोजेक्ट के ऊपर काम करना शुरु कर दिया। इस निशा (रात) को कैसे रात की रानी बनाना है। मुझे तो उसकी चूत के साथ-साथ गाँड भी मारनी है और उसे लंड भी चुसवाना है। सबसे बड़ी बात तो उसे सेक्स के लिए तैयार करना ही मुश्किल है। समय कम और मुक़ाबला सख्त। ख़ैर मुहब्बत-ए-मर्दा, मदद-ए-ख़ुदा।

लैपटॉप में वायरस था जिसके कारण विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम की फाइलें ख़राब हो गईं थीं। ये तो मेरे बाएँ हाथ का खेल था। पर मैं इसे अभी ठीक नहीं किया। मैंने उसके बैग की जाँच की। उसमें दवाईयों के नमूने, कागज़, और मेकअप का छोटा-मोटा सामान था। मैंने बोरोलीन जैसी खुशबू वाली क्रीम की ट्यूब, वैसलीन की डिब्बी, एक छोटा सा शीशा और नैपकीन निकाल कर सिरहाने के नीचे रख लिए।

अब मुझे अपने परियोजना की पूरी तरह से तैयारी के बारे में सोचना ता। दो तीन विकल्प भी रखने थे। सही-सही क्रियान्वयन के लिए कार्यक्रम बनाना था। मज़बूत पक्ष, कमज़ोर पक्ष, मौक़े, संभावित हानियाँ सभी को ध्यान में रखकर कार्यक्रम शुरु करना था। मैंने कई विकल्पों पर विचार किया और फिर सब कुछ अपने दिमाग़ में सोच कर के फ्लो-चार्ट बनाने लगा। मुझे चुदाई का यह कार्यक्रम ३ चरणों में पूरा करना था।

मैंने एक बार स्टडी-रूम की ओर जाकर देखा। निशा कम्प्यूटर पर लगी थी। कोई ४० मिनट तो बीत ही गए थे। निशा का काम भी खत्म होने ही वाला होगा। मैंने उससे पूछा कि कितना समय और लगेगा तो उसने बताया कि कोई १५-२० मिनट और लगेंगे। मैंने दराज़ में से ऑपरेटिंग सिस्टम की सीडी ली और वापिस बेडरूम में आ गया। मैंने फाईलों को फिर से डाल दिया और वायरस स्कैन चालू कर दिया। उसका कम्प्यूटर काम करने लगा। इस काम में मुझे १०-१५ मिनट लगे। जब मैं सीडी वापिस रखने स्टडी रूम में गया तो निशा मेरा कम्प्यूटर बन्द ही करने जा रही थी। मैं दरवाजे के बाहर ही रूक कर अन्दर देखने लगा। उसने स्टार्ट मेनू पर क्लिक किया। शट डाउन पर क्लिक करने की बजाय उसने रीसेन्ट डॉक्यूमेन्ट मेनू खोला। मेरी आँखें चमकने लगीं। फिर उसने ऊपर से नीचे तक फाईलों की सूची देखी। उसकी निगाहें कुछ वीडियो फाईल पर पड़ीं। उसने राईट क्लिक करके उस फाईल का स्त्रोत देखा। अगर आप थोड़ा बहुत कम्प्यूटर जानते हों तो यह सब बातें आपको पता रहेंगी ही। ये वही फाईलें थीं जो मैंने आज सुबह ही कम्प्यूटर पर कॉपी की थी, और २-३ देखी भी थी। इस फाईल पर क्लिक करते ही फिल्म चलनी शुरु हो गई। मेरा काम हो गया था। मैं झट से उल्टे पाँव बेडरूम की ओर भागा।
आप शायद सोच रहे होंगे अब वापस आने का नहीं साली को पटक कर चोदने का समय था। आप ग़लत सोच रहे हैं। मैं कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती में विश्वास नहीं करता हूँ। मैं तो प्रेम का पुजारी हूँ। मैंने अब तक जितनी भी चूत या गाँड मारी है वो सभी अपने दोनों हाथों में जैसे अपनी चूत और गाँड लेकर मेरे पास आईं हैं। मैं उसे भी इसी तरह चोदना चाहता था। मैं उसे इतना गरम कर देना चाहता था कि वह ख़ुद चल कर मुझसे चूत और गाँड मारने को कहे, तभी तो चुदाई का असली मज़ा आता है। किसी को मजबूर करके चोदना तो बस पानी निकालनी वाली बात होती है।

मुझे पता था साली फिल्म के एक दो सीन ही देखेगी और फिर उसे बन्द करके मेरे बेडरूम में यह चेक करने आएगी कि मैं क्या कर रहा हूँ। कोई देख तो नहीं रहा। मैं भी इस मामले में पक्का खिलाड़ी हूँ। मैं उसके लैपटॉप को ठीक करने की पूरी एक्टिंग कर रहा था। वो चुपके से आई और एक निगाह डालते हुए दबे पाँव वापस चली गई। हे लिंग माहदेव ! तेरा लाख-लाख धन्यवाद। काले हब्शी और गोरी फिरंगी की गाँड-चुदाई और एक ४० साल की आँटी की एक १५-१६ साल के लड़के के साथ चुदाई देखकर तो मेरी रात की रानी गुलज़ार हो जाएगी। मेरे कार्यक्रम का पहला चरण सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया था।

कोई २५-३० मिनट के बाद निशा बेडरूम की ओर आई। उसकी आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे। होश उड़े हुए, चाल में लड़खड़ाहट, होंठ सूखे हुए। वो तो बस इतनी ही बोल पाई, "जीजू क्या कर रहे हो?" शायद अपनी उखड़ी साँसों पर क़ाबू पाना चाहती थी।

"बस तुम्हारा लैपटॉप ही ठीक कर रहा था। वायरस था, विंडोज़ की फाईलें ख़राब हो गईं थीं। मैंने ठीक कर दिया है। तुमने इन्टरनेट से कोई ग़लत-सलत फाईल तो नहीं खोलीं थीं?" मैंने पूछा।

अब तो उसके चेहरे का रंग देखने लायक था। "ननन... नहीं तो.."

"कोई बात नहीं पर तुम इतना घबराती क्यों हो?"

"वो.. वो बिजली कड़क रही है ना" अजीब संयोग था कि उसी समय ज़ोर से बिजली फिर कड़की थी। बाहर अब भी पानी बरस रहा था। मैं जानता था कि वो कौन सी बिजली की बात कर रही है। वो मेरे पास आकर बैठ गई।

"जीजू सोने का क्या करेंगे?" वो बोली

मैंने मन में सोचा 'मेरी जान, तुम्हें सोने कौन देगा आज की रात।' पर मैंने कहा "भाई बिस्तर लगा है सो जाओ।"

"अरे भाई बहुत सीधी बात है दिल का २७ किलो तो हटा ही दो, फिर असली वज़न तो २१ किलो ही रहा ना?"

"तो आप भी मानते हैं कि हम झाँसी वालों का दिल बड़ा होता है।" उसने छाती तानते हुए कहा। सचमुच उसकी घुण्डियाँ कड़ी हो रहीं थीं।

"दिल बड़ा नहीं, पत्थर का है।"

"क्या मतलब?"

"चलो वो बाद में बताऊँगा।" मैंने बात को अपने प्रोजेक्ट की ओर मोड़ना चाहा। "देखो ये सब ज्योतिषीय गणित है। प्रकृति ने सब चीजें अपने हिसाब से बनाई हैं। सब चीजें एक सही अनुपात में होतीं हैं। उन्हें तो मानना ही पड़ेगा ना?"

"वो कैसे?"

"अब देखो ना भगवान ने हमारी नाक तुम्हारे अँगूठे जितनी बड़ी बनाई है।" उसने हैरानी से अपनी नाक पर हाथ लगाया और मेरी ओर देखने लगी।

"विश्वास नहीं होता तो नाप कर देख लो।" मैंने पास रखा फीता उसकी ओर बढ़ा दिया। उसने अपना अँगूठा नापा जो ७ से.मी. निकला। फिर मैंने उसकी नाक पर फीता रख कर नाप लिया। इस दौरान मैं उसके गाल छूने से बाज नहीं आया। काश्मीरी सेब हों जैसे। उसकी नाक का नाप भी ७ से.मी. ही निकला। फिर मैंने कहा, तुम्हारी मध्यमा (बीच की) उँगली मापो। जब उसने नापी तो वह ९ से.मी. निकली। अब मैंने उससे कहा कि अपने कान की लम्बाई नापो। ये काम तो मुझे ही करना था। इस बार मैंने उसका दूसरा गाल भी छू लिया। क्या मस्त मुलायम चिकना स्पर्श था। साली के गाल इतने मस्त हैं तो चूचियाँ तो कमाल की होंगी। ख़ैर कान का नाप भी ९ से.मी., होना ही था।

"अरे ये तो कमाल हो गया?" वह हैरानी से बोली तो मैंने कहा, "मैं बिना नापे तुम्हारी लम्बाई भी बता सकता हूँ।"

"वो कैसे?"

"तुम्हारे हाथ की लम्बाई का ढाई गुणा होगी।" उसने मेरी ओर हैरानी से देखा तो मैंने कहा "नाप कर देख लो।"

"मेरे कार्यक्रम का फ्लो-चार्ट बिल्कुल सही दिशा में जा रहा था। अब उसके नाज़ुक संतरों की बारी थी। चिड़िया अपने आप को बड़ा होशियार समझती थी। पर मैं भी प्रेम-गुरु ऐसी ही नहीं हूँ। मैंने फीता उठाया और ढीले टॉप के अन्दर उसकी काँख से सटा दी। वो क्या बोलती? चुप रही। उसकी काँख सफाचट थी। बालों का नामों-निशान नहीं। थोड़ी सी चूचियों की झलक भी मिल गई। एकदम सख़्त। घुण्डियाँ कड़क। गोरे-गोरे.. इलाहाबादी अमरूद जैसे।

हाथ की लम्बाई ६३ से.मी. निकली। मैंने कहा तुम्हारी लम्बाई १५८ से.मी. यानि कि ५ फीट ३ इंच के आस-पास है।"
"ओह, वेरी गुड, क़माल है जीजू।" उसकी आँखें तो फटी ही रह गईं। वो फिर बोली "जीजू जॉब का भी बताओ ना" मैं उसे प्रभावित करने में सफल हो गया था।

अब कार्यक्रम के दूसरे भाग की अन्तिम लाईन लिखनी थी। मैंने कहा "एक और बात है ऊपर के होंठ और नीचे के होंठ भी बिल्कुल एक समान होते हैं।"

"नहीं ये ग़लत है नीचे के होंठ थोड़े मोटे होते हैं। मेरे होंठ ज़रा ध्यान से देखो, नीचे का मोटा है या नहीं?" निशा अपने मुँह वाले होंठों की बात ही समझ रही थी, उसे क्या पता कि मैं तो चूत के होंठों की बात कर रहा था।

"अरे मैं मुँह के होंठों की नहीं दूसरे होठों की बात कर रहा था। अच्छा चलो बताओ औरतें ज़्यादा बातें क्यों करतीं हैं?" मैंने पूछा।

क्यों...?" उसने आँखें तरेरते हुए पूछा। वो अब मेरी बात का मतलब कुछ-कुछ समझ रही थी।

"अरे भाई उनके चार होंठ होते हैं ना। दो ऊपर और दो नीचे" मैंने हँसते हुए कहा।

"क्या मतलब..." उसकी निगाह झट से अपनी चूत की ओर चली गई, वहाँ तो अब चूत-रस की बाढ़ ही आ गई थी. उसने झट से तकिया अपनी गोद में रख लिया और फिर बोली, "ओह जीजू, आख़िर तुम अपनी औक़ात पर आ ही गए... मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी। अकेली मज़बूर लड़की जानकर उसे तंग कर रहे हो। मुझे नींद आ रही है।" वो नाराज़ सी हो गई।

प्यार पाठकों और पाठिकाओं, मेरे कार्यक्रम का दूसरा चरण पूरा हो गया था. आप सोच रहे होंगे भला ये क्या बात हुई। लौण्डिया तो नाराज़ होकर सोने जा रही है? थोड़ा सब्र कीजिए अभी मेरा तीसरा चरण पूरा कहाँ हुआ है।

मैं जानता था साली गरम हो चुकी है। उसकी चूत ने दनादन पानी छोड़ना शुरु कर दिया है और अब तो पानी रिस कर उसकी गाँड को भी तर कर रहा होगा। अब तो बस दिल्ली दो क़दम की दूर ही रह गई है। मेरा अनुभव कहता है कि इस तरह की बात के बाद लड़की इतनी ज़ोर से नाराज़ हो जाती है कि बवाल मचा देती है, पर निशा तो बस सोने की ही बात कर रही थी. मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा

"अरे तुम बुरा मान गई... ये मैं नहीं प्रेम-आश्रम वाले गुरुजी कहते हैं। अच्छा चलो अब सो ही जाते हैं। पर एक समस्या है?"

"वो क्या?"

"दरअसल मैं सोने से पहले दूध पीता हूँ।"

"ये क्या समस्या है, रसोई में जाकर पी लो।"

"वो... वो... रसोई में लाईट नहीं है ना। बिना लाईट के मुझे डर लगता है।"

"ऐसे तो बड़े शेर बनते हो।"

"तुम भी तो झाँसी की शेरनी हो, तुम ही ला दो ना।"

"मैं.. मैं... " इतने में ज़ोर की बिजली कड़की और निशा डर के मारे मेरी ख़िसक आई "मुझे भी अँधेरे से डर लगता है।"

"हे भगवान इस प्यासे को कोई मदद नहीं करना चाहता" मैंने तड़पते हुए मजनू की तरह जब शीशे पर हाथ रख एक्टिंग की तो निशा की हँसी निकल गई।

"मैं क्या मदद कर सकती हूँ?" उसने हँसते हुए पूछा

"तुम अपना ही पिला दो।"

"क्या मतलब?" उसने झट से अपना हाथ अपने उरोजों पर रख लिए "जीजू तुम फिर...?"

इतने बड़े अमृत-कलशों में दूध भरा पड़ा है थोड़ा सा पिला दो ना तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा" मैंने लगभग गिड़गिड़ाने के अन्दाज़ में कहा।

तो निशा पहले तो हँस पड़ी फिर नाराज़ होकर बोली,"जीजू तुम हद पार कर रहे हो।"

"अभी पार कहाँ की है तुम कहाँ पार करने दे रही हो?"

"जीजू मुझे नींद आ रही है" उसने आँखें तरेरते हुए कहा।

"हे भगवान क्या ज़माना आ गया है। कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता।" निशा हँसते हुए जा रही थी। मैंने अपनी एक्टिंग करनी जारी रखी "सुना है झाँसी के लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है पर अब पता चला कि बड़ा नहीं पत्थर होता है और पत्थर ही क्या पूरा पहाड़ ही होता है, टस से मस ही नहीं होता, पिघलता ही नहीं।" निशा हँसते-हँसते दोहरी होती जा रही थी। पर मेरी ऐक्टिंग चालू थी। "हे भगवान, इन ख़ूबसूरत लड़िकयों का दिल इतना पत्थर का क्यों बनाया है, इससे अच्छा तो इन्हें काली-कलूटी ही बना देता कम से कम किसी प्यासे पर तरस तो आ जाता।" मैंने अपनी ऐक्टिंग चालू रखी।

मैं तो शोले वाला वीरू ही बना था "जब कोई दूध का प्यासा मरता है तो अगले जन्म में वो कनख़जूरा या तिलचट्टा बनता है। हे भगवान, मुझे कनख़जूरा या तिलचट्टा बनने से बचा लो। हे भगवान मुझे नहीं तो कम से कम इस झाँसी की रानी को ही बचा लो।"

"क्या मतलब?"

"सुना है दूध के प्यासे मरते व्यक्ति की बददुआ से वो कंजूस लड़की अगले जन्म में जंगली बिल्ली बनती है। और इस ज्न्म में उसकी शादी २४वीं साल ही हो जाती है और अगले ३ सालों में ६ बच्चे भी हो जाते हैं।" मैंने आँखें बन्द किए अपने दोनों हाथ ऊपर फैलाए।

हँसते-हँसते निशा का बुरा हाल था। वो बोली "३ साल में ६ बच्चे... वो कैसे?"

मेरे कार्यक्रम की तो अब बस चंद लाईनें ही लिखनीं बाकी रह गई थीं। चिड़िया ने दाना चुगने के लिए जाल की ओर बढ़ना शुरु कर दिया था। मैंने कहा "अच्छा सच्चे आशिक़ की दुआ हो और भगवान की मर्ज़ी हो तो सबकुछ हो सकता है। हर साल दो-दो जुड़वाँ बच्चे पैदा हो सकते हैं।"

निशा ठहाके मारने लगी थी। हँसते-हँसते वो दोहरी होती जा रही थी। मैंने कहा चलो दूध नहीं पिलाना, ना सही, पर कम से कम एक बार दूध-कलश देख ही लेने दो।"

"देखने से क्या होगा?"

"मुझे तसल्ली हो जाएगी... एक झलक दिखाने से तुम्हारा क्या घिस जाएगा, प्लीज़ एक बार।"

"ओह... जीजू तुम भी ना... नहीं... ओह... तुम भी एक नम्बर के बदमाश हो, मुझे अपनी बातों के जाल में फिर उलझा ही लिया ना, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है।"

"अरे किसी की प्यास बुझाने से पुण्य मिलता है।"

निशा अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। उसके मन में कशमकश चल रही थी कि आगे बढ़े या नहीं। मैं जानता हूँ पहली बार की चुदाई से सभी डरतीं हैं। और वो तो अभी अनछुई कुँवारी कली थी। पर मेरा कार्यक्रम बिल्कुल सम्पूर्ण था। मेरे चुंगल से वो भला कैसे निकल सकती थी। उसने आँखें बन्द कर रखीं थीं।

फिर धीरे से बोली "बस एक बार ही देखना है और कोई शैतानी नहीं समझे?"

"ठीक है बस एक बार एक मिनट और २० सेकेण्ड के लिए, ओके, पक्का... प्रॉमिस... सच्ची..." मैंने अपने कान पकड़ लिए। उसकी हँसी निकल गई।

दोस्तों मेरे कार्यक्रम का तीसरा और अन्तिम चरण पूरा हो गया था। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कमोबेश यही हालत निसा की भी थी। उसने काँपती आवाज़ में कहा "अच्छा पहले लाईट बन्द करो, मुझे शर्म आती है।"

ओह... अँधेरे में क्या दिखाई देगा? और फिर वो जंगली बिल्ली आ गई तो?"

"ओह.. जीजू.. .तुम भी..." इस बार उसने एक नम्बर का बदमाश नहीं कहा। और फिर उसने आँखें बन्द किए हुए ही काँपते हाथों से अपना टॉप थोड़ा सा उठा दिया...

उफ्फ... सिन्दूरी आमों जैसे दो रस-कूप मेरे सामने थे। ऐरोला कोई कैरम की गोटी जितना गुलाबी रंग का। घुण्डियाँ बिल्कुल तने हुए चने के दाने जितने। मैं तो बस मंत्रमुग्ध हो देखता ही रह गया। मुझे लगा जैसे मिक्की ही मेरे सामने बैठी है। उसके रस-कूप मिक्की से थोड़े ही बड़े थे पर थोड़े से नीचे झुके, जबकि मुक्की के बिल्कुल सुडौल थे. मैंने एक हाथ से हौले से उन्हें छू दिया। उफ्फ... क्या मुलायम नाज़ुक रेशमी अहसास था। जैसे ही मैंने उनपर अपनी जीभ रखी तो निसा की एक मीठी सी सीत्कार निकल गई।

"ओह जीजू... केवल देखने की बात हुई थी... ओह... ओह... यहा... अब... बस करो... मुझे से नहीं रुका जाएगा..." मैंने एक अमृत कलश पर जीभ रख दी और उसे चूसना चालू कर दिया। निशा की सीत्कार अब भी चालू थी। "ओह... जी... जू.... मुझे क्या कर दिया तुमने... ओह.. चोदो मुझे... आह। हाआआयय्य्ययय... ऊईईईईईई... माँ........ आआआहहहह... बस अब ओर नहीं, एक मिनट हो गया है" उसने मेरे सिर के बालों को अपने दोनों हाथों में ज़ोर से पकड़ लिया और अपनी छाती की ओर दबाने लगी। मैं कभी एक उरोज को चूसता, कभी दूसरे को। वो मस्त हुई आँखें बन्द किए मेरे बालों को ज़ोर से खींचती सीत्कार किए जा रही थी। इसी अवस्था में हम कोई ८-१० मिनट तो ज़रूर रहें होंगे। अचानक उसने मेरा सिर पकड़ कर ऊपर उठाया और मेरे होंठों को चूमने लगी, जैसे वो कई जन्मों की प्यासी थी। हम दोनों फ्रेंच किस्स करते रहे। फिर उसने मुझे नीचे ढकेल दिया और मेरे ऊपर लेट कर मेरे होंठ चूसने लगी। मेरा पप्पू तो अकड़ कर कुतुबमीनार बना पाजामे में अपना सिर फोड़ रहा था। मैं उसकी पीठ और नितम्बों पर हाथ फेर रहा था। क्या मुलायम दो ख़रबूज़े जैसे नितम्ब, कि किसी नामर्द का भी लंड खड़ा कर दे। मैंने उसकी गहरी होती खाई में अपनी उँगलियाँ फिरानी शुरु कर दी। उसकी चूत से रिसते कामरस से गीली उसकी चूत और गाँड का स्पर्श तो ऐसा था जैसे मैं स्वर्ग में ही पहुँच गया हूँ।

कोई ५ मिनट तक तो उसने मेरे होंठ चूसे ही होंगे। वैसे ही जैसे उस ब्लैक फॉक्स ने उस १५-१६ साल के लड़के के चूसे थे। फिर वो थोड़ी सी उठी और मेरे सीने पर ३-४ मुक्के लगा दिए। और बोली "जीजू तुमने आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया ना!"

मैंने धीरे से कहा "ख़राब नहीं प्यार करना सिखाया है"

"जीजू तुम एक नम्बर के बदमाश हो"

मैंने अपने मन में कहा 'मेरी रानी मैं एक नम्बर का नहीं दो नम्बर का भी बदमाश हूँ, थोड़ी देर बाद पता चलेगा' पर मैंने कहा "अरे छोड़ो इन बातों को जवानी के मज़ा लो, इस रात को यादगार रात बनाओ"

"नहीं जीजू, यह ठीक नहीं होगा। मैं अभी तक कुँवारी हूँ। मैंने पहले किसी के साथ कुछ नहीं किया। मुझे डर लग रहा है कोई गड़बड़ हो गई तो?"

"अरे मेरी रानी अब इतनी दूर आ ही गए हैं तो डर कैसा तुम तो बेकार डर रही हो, सभी मज़ा लेते हैं। इस जवानी को इतना क्यों दफ़ना रही हो। अपने मन और दिल से पूछो वो क्या कहता है।" मैंने अपना राम-बाण चला दिया। मैं जानता था वो पूरी तरह तैयार है पर पहली बार है इसलिए डर रही है। मन में हिचकिचाहट है। मेरे थोड़े से उकसावे पर वह चुदाई के लिए तैयार हो जाएगी। चूत और दिल इसके बस में अब कहाँ हैं, वो तो कब के मेरे हो चुके हैं। बस ये जो दिमाग में थोड़ा सा खलल है, मना कर रहा है। मेरी परियोजना का अन्तिम भाग सफलता पूर्वक पूरा हो गया था। अब तो बस उत्पाद का उदघाटन करना था।

दोस्तों अब मुठ मारना बन्द करो, अरे भाई आज रात के लिए कुछ तो बचा कर रखो, क्या आप को रोज़ गाँड नहीं मारनी? और मेरी प्यारी पाठिकाओं, आप भी अपनी गीली पैन्टी में उँगली करना छोड़ो और आज रात की तैयारी करो।

मैंने उसका टॉप उतार दिया। दोनों क़बूतर आज़ाद हो गए। वो आँखें बन्द करके लेटी थी। होंठ काँप रहे थे। मैंने अभी तक उसकी चूत को हाथ भी नहीं लगाया था। आप तो जानते हैं मैं प्रेम गुरु हूँ और जल्दीबाज़ी में विश्वास नहीं रखता हूँ। मैं तो उसके मुँह से कहलवाना चाहता था कि 'मुझे चोदो'। अब मैंने उसके होठों पर उसके होंठ रख दिए। उसके नरम नाज़ुक रसीले होठ नहीं जैसे शहद से भरी फूलों की पँखुड़ियाँ हों। मैंने उसे गालों पर, पलकों पर, माथे पर, गले पर, कान पर, दोनों उरोजों पर, और नाभी पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। वो आआहहह... उहहहह... करती जा रही थी। अपने पैर पटक रही थी। उसकी सीत्कार तेज़ होती जा रही थी। वो बोली "ये मुझे क्या होता जा रहा है..." वो रोमांच से काँप रही थी। मैं जानता था अब वह झड़ने वाली है। अरे वो तो बिल्कुल कच्ची कली ही निकली। उसका शरीर अकड़ा और उसने मेरे होंठ ही काट लिए। उसके नाखून मेरी पीठ पर चुभ रहे थे। उसने एक हल्की सी सिसकारी मारी। लगता है उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। फिर वह ठंडी पड़ गई।

मैंने अपने कपड़े उतार दिए। सिर्फ चड्डी पहनी रखी। पप्पू महाराज ने अपना सिर चिपकी हुई चड्डी से भी बाहर निकाल ही लिया। उस बेचारे के क्या दोष था। अब निशा की बेल-बॉटम हटाने का वक्त आ गया था। निशा आँखें बन्द किए लेटी थी। मैंने उसकी सैलेक्स (सूती के पाजामे जैसी) के इलास्टिक को धीरे-धीरे नीचे करना शुरु किया। (उसने फिर बत्ती बन्द करने को कहा, तो मैंने कहा कि वो जंगली बिल्ली आ गई तो तुम्हारा दूध पी जाएगी और मैं भूखा ही रह जाऊँगा, रहने दो।) निशा ने अपने चूतड़ थोड़े से ऊपर कर दिए। प्यारे पाठकों, और पाठिकाओं ! अब तो स्वर्ग का द्वार बस एक दो इंच ही रह गया था। चूत का अनावरण होने ही वाला था। मेरा पप्पू तो ठुमके पर ठुमका लगा रहा था। उसने तीन-चार वीर्य की पहली बूँदें छोड़ ही दीं। वो तो इस स्वर्ग के द्वार के दर्शन के लिए कब से बेताब़ था।पहले छोटे-छोटे रेशमी बाल (उन्हें झाँट तो कतई नहीं कहा जा सकता) नज़र आए, और फिर किशमिश का दाना और फिर दो भागों में बँटी हुई उसकी नाज़ुक सी मक्खन मलाई सी चूत की फाँकें। गुलाबी रंगत लिए हुए। चूत के दोनों होठों पर हल्के-हल्के बाल। बीच में हल्की चॉकलेटी रंग की मोटी सी दरार। चीरे की लम्बाई ३ इंच से ज़्यादा बिल्कुल नहीं थी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, ऊपर और नीचे के होंठों में रत्ती फर भी फ़र्क नहीं था। मोटे-मोटे गुलाबी रंग के संतरे की फाँके हों जैसे। दाईं जाँघ पर वो काला तिल। जैसे मेरे कत्ल का पूरा इन्तज़ाम किए हो। उसकी चूत काम-रस से सराबोर नीम गीली थी। मैंने अपने हाथों की दोनों उँगलियों से उसकी चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे से चौड़ा किया। एक हल्की सी 'पट' की आवाज़ के साथ एक गहरा सा चीरा खुल गया।

उफ्फ.. सुर्ख लाल पकौड़े जैसी चूत एक दम गुलाबी रंग की थी। ऊपर अनार दाना, उसके नीचे मूत्र-छिद्र माचिस की तीली की नोक जितना बड़ा। आईला... और उसका फिंच... स्स्स्सी... का सिस्कारा तो कमाल का होगा। एक बार मूतते हुए ज़रूर चुम्मा लूँगा. मूत्र-छिद्र के ठीक एक इंच नीचे स्वर्ग-गुफ़ा का छोदा सा बन्द द्वार जिसमें से हल्का-हल्का सा सफेद पानी झर रहा था। मैंने अपनी जीभ जैसी ही उसकी मदन-मणि के दाने पर रखी तो उसकी एक सीत्कार निकल गई। मैंने जीभ को उसके मूत्र-छिद्र पर फिराया और फिर उसके स्वर्ग-द्वार पर। कच्चे नारियल, पेशाब और पसीने जैसी मादक सुगन्ध मेरे नथुनों में भर गई। कुछ मीठा, खट्टा, नमकीन सा स्वाद भला मैं कैसे नहीं पहचानता, जैसे मिक्की ही मेरे सामने लेटी हो। निशा तो अब किलकारियाँ मारने लगी थी। उसने अपने नितम्ब ऊपर-नीचे उठाते हुए अपनी चूत मेरे मुँह से चिपका दीं। मेरे सिर को दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ लिया और ज़ोर से बाल नोच लिए। इसमें उस बेचारी का क्या दोष। मुझे लगा अगर यही हालत रही तो मैं जल्दी ही गंजा हो जाऊँगा। पर अगर ऐसी चूत के लिए गंजा भी होना पड़े तो कोई ग़म नहीं।

उसने उत्तेजना में अपने पाँव ऊपर उठा लिए और मेरे गले के गिर्द लिपट दिए ज़ोर से। मैंने उसकी पूरी की पूरी चूत को अपने मुँह में भर लिया था, वह थी भी कितनी, एक छोटे परवल या सिंघाड़े जितनी ही तो थी। मैंने उसे ज़ोर से चूसा तो निशा ने इतनी ज़ोर की किलकारी मारी कि अगर बाहर तेज़ बारिश और बिजली नही कड़क रही होती तो पड़ोस वाले अवश्य ही सुन लेते। उसके साथ ही उसकी चूत ने कोई ३-४ चम्मच शहद जैसे मीठे नमकीन खट्टे नारियल पानी और पेशाब की मिली-जुली सुगन्ध जैसे काम-रस छोड़ दिया जिससे मेरा मुँह लबालब भर गया। सही मायने में निशा का यह पहला स्खलन था। मैं तो उसे चटकारे लेकर पी ही गया।

दोस्तों, २ उत्पादों की लाँचिंग सफलतापूर्वक हो गई थी। अब चूत और गाँड की चुदाई तथा लंड चुसवाना बाकी था। सबसे पहले चूत की बारी थी, फिर लंड-चुसाई और अन्त में गाँड। आईये अब चूत-रानी का उदघाटन करते हैं। आप तैयार है ना। मेरा पप्पू तो मुझे आज ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। बहुत तड़पाया है इस चूत ने उसे। पूरे २ घंटे से एकदम सावधान की स्थिति में सलामी मार रहा है। निशा बेसुध सी आँखें बन्द किए लेटी थी। थोड़ी देर बाद उसने अपनी जाँघों की कैंची ढीली की और मेरा सिर पकड़ कर ऊपर की ओर सरकाया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रखकर चूसने लगी। २-३ मिनट चूसने के बाद वो बोली "जीजू मुझे पता नहीं ये क्या होता जा रहा है। एक मदहोशी सी छा रही है। कुछ करो ना... उफ्फ... हाय्य्य्यययय..." एक ज़ोर की सीत्कार उसने ली। लगता था वो एक बार फिर झड़ गई है।

मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने अपनी चड्डी फाड़ फेंकी। मेरा ७" का पप्पू आज तो लोहे की तरह सख़्त था। उसकी लम्बाई आधा इंच बढ़कर ७.५ इंच हो गई थी। मैंने कहा "क्या करूँ मेरी जान?"

"ओह... जीजू... अब मत तरसाओ... कर लो अपने मन की। ओह आप मेरे मुँह से क्या सुनना चाहते हैं। मुझे शर्म आती है। प्लीज़..." कुछ ना कहते हुए भी उसने सबकुछ कह दिया था। मैंने अपने लंड को उसकी चूत पर लगा दिया।

"ऊईईईई... माँआआ.... ओहहहह... जीजू वो... वो... निरोध (कॉण्डोम) तो लगा लो" निशा की आवाज़ काँप रही थी।

"मेरी रानी निरोध से मज़ा नहीं आएगा।"

"पर वो... वो... अगर मैं गर्भवती हो गई तो...?"

"मेरी जान फिर तुम्हारा नया उत्पाद किस दिन काम आएगा? सिर्फ एक महीने में एक गोली?" मैंने कहा, और मन में सोचा 'साली मुझे पपलू समझती है।'

"ओह... जीजू, तुम भी एक नम्बर के बदमाश हो..." और उसने मुझे कससकर अपनी बाँहों में भर लिया।

"नहीं, मैं तो २ नम्बर का बदमाश हूँ।" मैंने कहा।

"क्या मतलब?"

"वो बाद में अभी तो एक नम्बर का ही मज़ा लो।" और मैंने तकिये के नीचे से वैसलीन की डिब्बी से थोड़ी से वैसलीन निकाली और अपने लंड और निशा की चूत में एक उँगली भर कर गच्च से डाल दी। उसकी हल्की सी चीख निकल गई। मैंने ५-७ बार उँगली अन्दर-बाहर की। हे भगवान, साली की क्या मस्त सँकरी चूत है। एकदम कच्ची कली जैसी, फ़कत कुँवारी, कोरी रसमलाई जैसी। अब देर करना ठीक नहीं था।

मैंने अपने पप्पू को उसकी चूत के मुहाने पर रका और उसकी कमर के नीचे एक हाथ डाला। उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया और फिर एक ही झटके में ३ इंच लंड अन्दर ठोंक दिया। निशा की घुटी-घुटी चीख निकल गई। मैं तो प्रेम-गुरु था। मुझे पता था वो ज़रूर चीखेगी, इसीलिए मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में ले रखा था। और उसकी कमर पकड़ रखी थी ताकि वो उछल कर मेरा काम ख़राब ना कर दे।

अभी धक्के मारने का समय नहीं हुआ था। कोई २-३ मिनट के बाद जब उसकी चूत कुछ आराम में आई और उसने पानी छोड़ा तब मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु किए पर अभी लंड पूरा नहीं घुसाया। मुझे पता था, अभी एक बाधा और बाक़ी है - उसकी झिल्ली उसकी सील उसकी नाज़ुक झिल्ली, उसकी कुँवारीच्छद। जिसके फटने का दर्द वो मुश्किल से सहन कर पाएगी। पर उसे भी तोड़ना था। मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फेरना चालू रखा। उसकी गाँड के छेद से जैसे ही मेरी उँगलियाँ टकराईं तो मैं तो रोमांच से भर उठा. बालों की कंघी के दाँत जैसी गाँड की तीख़ी नोकदार सिलवटों वाला छेद। आहहहह... क्या मस्त क़यामत है साली की गाँड की छेद

आप चौंक गए ना। आपने रोमांटिक कहानियों में ज़रूर सुना होगा कि लड़कियों की गाँड की छेद मुलायम होती है। अगर कोई ऐसा कहता है तो या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वो गाँड ज़रूर १५-२० बार लंड खा चुकी है। गुरुजी कहते हैं कि कुँवारी गाँड की पहचान तो उसके उभरे हुए सिलवटों से होती है। अगर आप इस लज्जत को महसूस करना चाहते हैं तो एक संतरे की फाँक लेकर उसकी पतली सफ़ेद झिल्ली को हटा दें। अब उसके जोये नज़र आएँगे। अपनी आँखें बन्द करके उन पर अपनी ऊँगली फिराएँ आप उसका नाज़ुकपन महसूस कर सकेंगे। हे भगवान जिस लड़की ने अपनी चूत में भी कभी उँगली ना की हो उसकी अनछुई कोरी गाँड मार कर तो अगर इस दुनिया से जाना भी पड़े तो ये सौदा कतई घाटे वाला नहीं है। आज तो इस गाँड के छेद में अपना रस भर कर स्वर्ग के इस दूसरे दरवाज़े का लुत्फ हर क़ीमत पर उठाना ही है। पर अभी तो चूत की चुदाई चल रही है। गाँड की बात बाद में। पप्पू तो इस ख़्याल से ही अड़ियल टट्टू बन गया है। पता नहीं ये सब्र करना कब सीखेगा। उसने दो-तीन ठुमके चूत के अन्दर लगाए तो निशा की चूत ने भी उसे कस कर अन्दर भींच लिया।

मैंने उसके नितम्बों के नीचे एक तकिया और लगा दिया और अपना एक हाथ उसकी पतली कमर के नीचे डाल कर पकड़ लिया। अपने होंठ उसके होंठों पर रख करक उन्हें चूमा और फिर दोनों होंठ अपने मुँह में भर लिए। वो तो पूरी गरम और मस्त हो चुकी थी। उसने तो अब नीचे से हल्के-हल्के धक्के भी लगाने शुरु कर दिए थे। मैंने अपना लंड थोड़ा सा बाहर निकाला और एक ज़ोरदार धक्का लगा दिया। धक्का इतना ज़बर्दस्त था कि उसकी सील को तोड़ता हुआ गच्च से जड़ तक उसकी चूत में समा गया। निशा की घुटी-घुटी चीख़ बाहर कड़कड़ाती बिजली की आवाज़ में दब गई। वो दर्द के मारे छटपटाने लगी। उसने मेरी पीठ पर अपने नाखून इतने ज़ोर से गड़ाए कि मेरी पीठ पर भी ख़ून छलक आया। उसकी चूत से ख़ून का फव्वारा छूटा और मेरे लंड को भिंगोता हुआ तकिए पर गिरने लगा। निशा की कसमसाहट से उसके होंठ मेरे मुँह से निकलते ही वो ज़ोर से चीख़ी "ओईईईईई... माँ.... मर... गईईईईईईईई..." और उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।

मैंने उससे कहा "बस मेरी रानी अब दर्द खत्म ! अब तो बस आनन्द ही आनन्द है। बस अब चुप करो" मैंने उसके नमकीन स्वाद वाले आँसूओं पर अपनी जीभ रख दी। "जीजू आप भी एक नम्बर के कसाई हो, मुझे मार ही डाला... ओओईईईईई... निकाल बाहर.. मैं मर जाऊँगी... उईईईईई माँआआआआ...." वो रोए जा रही थी। मैं जानता ता ये दर्द ३-४ मिनट का है बाद में तो बस मज़े ही मज़े। मेरा पप्पू तो जैसे निहाल ही हो गया। इतनी कसी हुई चूत तो मधु की भी नहीं लगी थी, सुहागरात में।

कोई ५ मिनट के बाद निशा कुछ संयत हुई। उसकी चूत ने भी फिर से रस छोड़ना चालू कर दिया। मैंने उसकी कपोलों, होंठों और माथे पर चुम्बन लेने शुरु कर दिए। फिर मैंने उससे पूछा "क्यों मेरी मैना, अब दर्द कैसा है?" तो वह बोली "जीजू आपने तो मेरी जान ही निकाल दी, कोई कुँवारी लड़की को ऐसे चोदता है?"

"देखो अब जो होना था हो गया हा, अब तो बस इसके आगे स्वर्ग का सा आनन्द ही आनन्द है" और मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु कर दिए। निशा को भी अब थोड़ा मज़ा आने लगा था। मैंने कहा "मेरी मैना, अब तुम कली से फूल बन गई हो और मैं तुम्हारा मिट्ठू"

निशा की हँसी निकल पड़ी और उसने २-३ मुक्के मेरी पीठ पर लगाते हुए कहा "तुम पूरे एक नम्बर के बदमाश हो। अपने शब्द जाल में फँसा कर आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया।" मैंने एक धक्का और लगाया तो वह चिहुँकी "ओईईई... आआहह... या... ओह अब रूको मत ऐसे ही धक्के लगाओ... आहहह... या.. ओई... मैं तो गईईईईईईई...." और उसके साथ ही वो एक बार फिर झड़ गई। मैं तो जैसे स्वर्ग में था। मैंने लगातार ८-१० धक्के और लगा दिए। अब तो उसकी चूत से फच्च-फच्च का मधुर संगीत बजने लगा था।

ये सिलसिला कोई २० मिनट तो ज़रूर चला होगा। मेरा पप्पू बेचारा कब तक लड़ता। आख़िर उसको भी शहीद होना ही था। मैंने दनादन ५-७ धक्के और लगा दिए। निशा भी फिर से झड़ने के कगार पर ही तो थी। और फिर... एक.. दो... तीन चार... पाँछ.. पता नहीं कितनी पिचकारियाँ मेरे पप्पू ने छोड़ दीं... निशा ने मुझे कस कर पकड़ लिया और उसकी चूत ने भी काम-रज छोड़ दिया। उसकी बाँहों में लिपटा मैं कोई १० मिनट उसके ऊपर ही पड़ा रहा।

१० मिनट के बाद निशा जैसे नींद से जागी। मैं उठ कर बैठ गया। निशा भी मेरी ओर सरक आई। उसने मेरे होंठों पर दो-तीन चुम्बन ले लिए। मैंने उस से थैंक यू कहा तो उसने कहा "गन्दे बच्चे मेरे प्यारे मिट्ठू..." और मेरी नाक पकड़ कर ज़ोर से दबा दी। मेरे तीसरे उत्पाद की लाँचिंग की ये बधाई ही तो थी।

मैं उसे गोद में उठा कर बाथरूम की ओर ले जाने लगा। उसने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दी और आँखें बन्द कर लीं। मैंने देखा पूरा तकिया मेरे वीर्य, निशा के ख़ून, और काम-रज़ से भीगा हुआ था। मैंने एक हाथ से उस तकिए को उल्टा कर दिया ताकि निशा इतना ख़ून देखकर डर ना जाए।

निशा पॉट पर बैठकर पेशाब करने लगी। आहहहह... फिच्च... स्स्स्सीईईई... का वो सिसकारा और मूत की पतली धार तो मिक्की जैसी ही थी। मैं तो मन्त्र-मुग्ध सा बस उस नज़ारे को देखता ही रह गया। पॉट पर बैठी निशा की चूत ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने मोटे शब्दों में अंग्रेज़ी में 'W' (डब्ल्यू) लिख दिया हो। उसकी चूत ऐसी लग रही थी जैसे एक छोटा करेला किसी ने छील कर बीच में से चीर दिया हो। चूत के होंठ सूजकर पकौड़े जैसे हो गए थे। बिल्कुल लाल गुलाबी। उसकी गाँड का भूरा और कत्थई रंग का छोटा सा छेद खुल और बन्द हो रहा था। मुझे अपने चौथे उत्पाद की याद आ गई... अरे भाई लंड भी तो चुसवाना था ना। मैंने उससे कहा "एक मिनट रूको, मूतना बन्द करो और उठो... प्लीज़ जल्दी"

"क्या हुआ?" निशा ने मूतना बन्द कर दिया और घबरा कर बीच में ही खड़ी हो गई। मैंने उसे अपनी ओर खींचा। मैं घुटनों के बल बैठ गया और उसकी चूत को दोनों हाथों से खोल करक उसकी मदन-मणि के दाने को चूसने लगा। वो तो आहहह... उहह्हह करती ही रह गई। उसने कहा "ओह... क्या कर रहे हो जीजू ओफ्फ्फ.. इसे साफ तो करने दो। ओह गन्दे बच्चे ओईईईई.. माँ..."

यही तो मैं चाहता था। मैं जानबूझ कर उसकी वीर्य और काम-रज से भरी चूत को चूस कर ये दिखाना चाहता था कि चुदाई में कुछ भी गन्दा नहीं होता, ताकि वह मेरा लण्ड चूसने में कोई कोताही ना बरते और कोई आनाकानी ना करे। "अरे प्यार में कुछ गन्दा नहीं होता" मैंने कहा। और फिर उसके किशमिश के दाने को चूसने लगा।

निशा कितनी देर तक बर्दाश्त करती। उसकी चूत के मूत्र-छिद्र से हल्की सी पेशाब की धार फिर चालू हो गई जो मेरी ठोड़ी से होती हुई गले के नीचे गिर सीने से होती मेरे प्पू और आँडों को जैसे धोती जा रही थी। उसने मेरे सिर के बाल पकड़ लिए कसकर। मैं तो मस्त हो गया। जब उसका पेशाब बन्द हुआ तो उसने नीचे झुक कर मेरे होंठ चूम लिए और अपने होठों पर जीभ फिराने लगी। उसे भी अपनी मूत का थोड़ा सा नमकीन स्वाद ज़रूर मिल ही गया।

हमने हल्का सा शॉवर लिया और साफ़-सफाई के बाद फिर बिस्तर पर आ गए। मैं बिस्तर पर टेक लगा कर बैठ गया। निशा अचानक उछली और मुझे एक तरफ लुढ़काते हुए मेरे पेट पर बैठ गई। उसकी दोनों टाँगें मेरे पेट के दोनों तरफ थी और उसके घुटने मुड़े हुए थे। उसने अपने होंठ मेरे होठों पर रख कर दो-तीन चुम्बन तड़ातड़ ले लिए। उसके सिन्दूरी आम मेरे सीने से लगे थे और उसके नितम्बों के नीचे मेरा पप्पू पीस रहा था। वो अपनी चूत और नितम्बों को भी थोड़ा-थोड़ा सा घिस रही ती। ऐसा करते हुए उसने अपनी जीभ की नोक से मेरी नाक चाटी और उसकी नोक अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। आईलाआआआ... मैं तो मस्त ही हो गया।

प्यारे दोस्तों आप सोच रहे होंगे कि इसमें मस्त होने वाली क्या बात है? नाक होंठ गाल तो हर लड़की चूस ही लेती है। आप गलत सोच रहे हैं। शायद आप औरतों की इस अदा को नहीं जानते। मेरी प्यारी पाठिकाएँ ज़रूर हँस रहीं हैं। वो अच्छी तरह इसका मतलब जानती हैं। नहीं समझे ना? चलो मैं बता देता हूँ...

इस बात से आप सहमत हैं ना कि जब कोई लड़का या आदमी किसी लड़की या औरत को कहता है कि तुम बहुत ख़ूबसरूत हो तो इसका मतलब साफ़ होता है कि वह उसे चोदना चाहता है। दूसरी बात जब आदमी किसी लड़की के होंठ चूसता है तो वो मन में सोच रहा है कि ये उसकी चूत वाले होंठ ही हैं। और इसी तरह जब कोई लड़की किसी आदमी की नाक चूस रही होती है तो अनजाने में उसका लण्ड ही चूस रही है। थोड़ा सा सब्र रखिए अभी पता चल जाएगा।

"निशा एक बताना तो मैं भूल ही गया" मैंने कहा।

"ऊँहह... अब कुछ मत बोलो बस मुझे प्यार करने दो अपने मिट्ठू को।" उसने फिर मेरे होठों को चूम लिया।

"आदमी के लण्ड की लम्बाई बिना नापे पता करनी हो तो कैसे पता करेंगे?"

"कैसे... क्या मतलब?"

"आदमी की नाक की लम्बाई से ३ गुणा बड़ा उसका लण्ड होता है।" मैंने कहा तो हैरानी से वो मेरी नाक देखने लगी "ओह... नो..."

"नाप कर देख लो" वो मेरी नाक चूमना छोड़ कर एक ओर हो गई और मैं बैठ गया। अब उसने मेरे पप्पू की ओर देखा और हाथ में लेकर उसे मसलने लगी। पप्पू तो बस इसी इन्तज़ार में था। उसने फिर ठुमके लगाने चालू कर दिए। दोस्तों अब लण्ड चुसवाने की बारी थी। मैं जानता हूँ पहली बार लण्ड चूसने में हर लड़की नखरे करती है और उसे गन्द काम समझती है। पर मैं भी प्रेम-गुरु ऐसे ही नहीं बना हूँ। मैंने भी पूरा कार्यक्रम की थी इस उत्पाद की लाँचिंग की।

मैंने उससे कहा "मेरी मैना मैं एक बार तुम्हारी मुनिया को चूसना चाहता हूँ।" भला उसे क्या ऐतराज़ हो सकता था। मैं लेट गया और उसके पैर अपने सिर के दोनों ओर कर दिए जिससे उसकी चूत मेरे मुँह के ठीक ऊपर आ गई। हम दोनों अब 69 की मुद्रा में थे। निशा मेरे ऊपर जो थी। मेरा पप्पू ठीक उसके मुँह के सामने था। मैंने झट से चूत की पंखुड़ियों को चौड़ा किया और गप्प से अपनी जीभ उस गुलाबी खाई में उतार दी। उत्तेजना में उसका शरीर काँपने लगा। मैंने उसकी चूत को ज़ोर-ज़ोर से चूसना चालू कर दिया, अब उसके पास मेरे लंड को चूसने के अलावा क्या रास्ता बचा था। उसने पहले मेरे पप्पू के सुपाड़े को चूमा और उसपर आए वीर्य की कुछ बूँदों चखा और फिर गप्प से उसे मुँह में भर कर चूसने लगी। आह... उसका नरम गीला और थोड़ा कुनकुना अहसास मुझे मस्त करक गया। मेरा पप्पू तो निहाल ही हो गया। मैंने अपनी जीभ उसकी गाँड के भूरे छेद पर भी फिरानी चालू कर दी। मुझे अपना पाँचवा उत्पाद भी तो लाँच करना था। अरे भाई गाँड भी मारनी थी ना। उसके लिए निशा को तैयार करना सबसे मुश्किल काम था। मैंने ४-५ बार अपनी जीभ उसकी गाँड पर फिराई तो वो एक किलकारी मारते हुए फिर झड़ गई। मैं अपना वीर्य उसके मुँह में अभी नहीं छोड़ना चाहता था। मुझे तो पहले उसकी गाँड का उदघाटन करना था। और फिर जैसा मैंने सोचा था वही हुआ।

निशा ज़ोर-ज़ोर की साँसे लेती हुई एक ओर लुढ़क गई। उसके उरोज साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। आँखें बन्द थीं। अचानक वह उठी और मेरे ऊपर आ कर मुझे कस कर अपनी बाँहों में जकड़ लिया। मैंने अपनी ऊँगली उसकी गाँड की छेद पर फिरानी शुरु कर दी। उफ्फ... क्या खुरदरा एहसास था। वो तो बस आँखें बन्द किए मुझसे चिपकी पड़ी थी। मैंने हौले से उसके होंठों पर एक चुम्मा लिया और कहा "मेरी रात कली, मेरी मैना क्या हुआ?"

"बस अब कुछ मत बोलो, एक बार मुझे फिर से..." और उसने मुझे चूम लिया।

"निशा एक और मज़ा लोगी?"

"क्या मतलब?" उसने चौंकते हुए मेरी तरफ़ देखा।

"मैं और मधु स्वर्ग के दूसरे द्वार का भी ख़ूब मज़ा लेते हैं।"

"क्या मतलब... वो... वो.. ओह... नो... नहीं..." वो तो ऐसे बिदकी जैसे किसी काली छतरी को देख कर भैंस बिदकती है "ओह जीजू तुम्हारा दिमाग तो ठीक है ना... क्या बात कर रहे हो?"

"अरे मेरी मैंना रानी औरत के तीन छेद होते हैं और तीनों में ही चुदाई की जाती है। चुदाई का असली आनन्द तो इस द्वार में ही है। एक बार मज़ा लेकर ते देखो, फिर तो रोज़ यही कहोगी कि अपना पेन ड्राईव अगले छेद में नहीं, मेरे पिछले छेद में ही डालो।"

"नहीं आप झूठ बोल रहे हैं। भला कोई इसमें करता है?"

"अरे इसमें झूठ वाली क्या बात है। मधु तो इसकी दीवानी है। हल तो हर शनिवार को इसका मज़ा लेते हैं।"

"ओह... अब मैं समझी मधु दीदी रविवार को थोड़ी टाँगें चौड़ी करके... ओह... इस्स्स..." जिस तरह निशा शरमाई थी मैं तो मर ही मिटा उसकी इस अदा पर। चिड़िया फँस जाएगी।

"देखो अब तक मैंने जितनी भी बातें तुम्हें बताई हैं क्यो कोई भी बात ग़लत निकली?"

"पर वो... वो.. इतना मोटा मेरे छोटे से छेद में... ओह नो... मुझे डर लगता है।" वो कुछ सोच नहीं पा रही थी।
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"अच्छा चलो एक टोटका तुम्हें दिखाता हूँ। अगर तुम्हें सही लगे तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं, गाँड मारना रद्द" मैंने कहा

"वो क्या है?"

दोस्तों अब तो भरतपुर लुटने को तैयार होने ही वाला है। बस २ मिनट की ओर देरी है। मैंने उससे कहा कि तुम उकड़ूँ बैठ जाओ। वह बैठ गई। अब मैंने तकिये के नीचे से बोरोलीन की ट्यूब निकाली ओर उसकी उँगली पर एक मटर के दाने जितनी क्रीम लगा दी। फिर उससे कहा कि तुम इसी अपनी मुनिया की पड़ोसन (गाँड पर यार) लगा लो। उसने ऐसा ही किया। अब मैंने उससे कहा कि खड़ी हो जाओ। वह खड़ी हो गई। फिर मैंने उसे बैठ जाने को कहा और एक छोटा सा शीशा जो मैंने उसके लैपटॉप के बैग से निकाला था उसकी गाँड की छेद पर रख दिया और कहा कि इस शीशे में अपनी रानी की शक्ल तो देखो जितनी दूर तक क्रीम फैल गई है, अगर लंड की मोटाई उस घेरे जितनी या कम है तो गाँड रानी को कोई परेशानी नहीं होगी। क्रीम का घेरा आयोडेक्स के शीशी के ढक्कन जितना था। मेरा लंड भी कमोबेश उतना ही मोटा तो है।
उसे तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। "पर... वो... वो... नहीं मुझे बहुत डर लग रहा है। सुना है इसमें करने पर बहुत दर्द होता है।"

"अच्छा चलो तुम्हें दर्द होगा तो नहीं करेंगे। एक बार प्रयास करने में क्या हर्ज़ है?"

"पर वो... वो ज़्यादा दर्द तो नहीं होगा ना कहीं...?" वो कुछ हिचकिचा रही थी। पर मेरा फ्लो-चार्ट और कार्यक्रम बिल्कुल पक्का था। अब बचना कहाँ संभव था।

मैंने उसे करवट लेकर सो जाने को कहा। वो बाईं करवट के बल लेट गई औऱ अपनी दाईं टाँग को सिकोड़ कर अपने सीने की ओर कर लिया। शायद आप सोच रहे होंगे 'गाँड मारने का ये कौन सा आसन हुआ। गाँड तो कुत्ते अथवा बिल्ली की मुद्रा में ही अच्छी तरह मारी जा सकती है?'

आप ग़लत सोच रहे हैं। लगता है आपने गाँड ना तो मरवाई है और ना ही मारी है। पहली गाँड चुदाई बड़ी ही सावधानी से की जाती है। पहली गाँड चुदाई में लड़की को ज़्यादा दर्द नहीं होना चाहिए नहीं तो बाद में लड़की कभी गाँड नहीं मरवाएगी। अब मैं घुटने मोड़कर उसकी बाईं जाँघ पर बैठ गया। इस तरह से जब मैं उसकी गाँड में लंड डालूँगा तो वह आगे की ओर नहीं खिसक पाएगी। कुतिया या घोड़ी शैली में यही तो मुश्किल होती है, जब भी आप धक्का लगाएँगे तो लड़की आगे की ओर हो जाएगी और लंड उसकी गाँड से फिसल जाएगा। ५-७ धक्कों के बाद आप बाहर ही खल्लास हो जाएँगे।

अब मैंने बोरोलीन की ट्यूब निकाली और टोपी खोल कर उसका मुँह उसकी गाँड की सुनहरी छेद पर लगा कर थोड़ा सा अन्दर किया। पहले से थोड़ी बोरोलीन लगी होने से ट्यूब की नॉब अन्दर चली गई। अब मैंने उस ट्यूब को ज़ोर से भींच दिया। "उईईईई... जीजूऊऊऊ गुदगुदी हो रही है" निशा थोड़ा सा चिहुँकी। वो आगे को सरक ही नहीं सकती थी। मैंने आधी से ज़्यादा ट्यूब उसकी गाँड में खाली कर दी। अब धीरे-धीरे मैंने उसकी गाँड के छेद पर मालिश करनी शुरु कर दी। बोरोलीन अन्दर पिघलने लगी थी। और मेरी उँगली उसकी गाँड की कसी हुई छेद के बावज़ूद भी आराम से अन्दर जाने लगी थी, प्यार से धीरे-धीरे। मुझे इस काम में कोई जल्दी नहीं करनी थी। मैं तो गाँड मारने का पक्का खिलाड़ी हूँ। निशा आआआहहह... उउउऊऊऊहहहह करने लगी। कोई ४-५ मिनट की घिसाई और उँगलीबाज़ी से उसकी गाँड तैयार हो गई थी। "ओह... जीजू अब डाल दो"

शाबास मेरी मैंना यही तो मैं चाहता था। अब मैंने वैसलीन की डिब्बी उठाई और लगभग आधी शीशी क्रीम अपने पप्पू पर लगा दी। आपको तो पता है मेरा सुपाड़ा आगे से थोड़ा पतला है। गाँड मारने के लिए अति उत्तम। मैंने सुपाड़े को उसकी गाँड पर लगा दिया। आह... क्या मस्त छेद था। दो गोल पहाड़ियों के बीच एक छोटी सी गुफ़ा जिसका दरवाज़ा कभी बन्द कभी खुल रहा था। निशा आआहहहह... उँहहहह... ओह... उउउऊऊईई.. किए जा रही थी।

दोस्तों और सहेलियों अब मेरे पाँचवें और अन्तिम उत्पाद की लाँचिंग थी। अगर आपको थोड़ा बहुत गाँडबाज़ी का शौक और अनुभव हो तो आप ज़रूर जानते होंगे कि सबसे कठिन काम गाँड के छल्ले को पार करना होता है। एक बार अगर सुपाड़ा उस छल्ले को पार कर गया तो समझो क़िला फ़तह हो गया। अन्दर तो बस गुब्बारे की तरह खाली कुँआ होता है। आप को बता दूँ लण्ड चाहे जितना भी बड़ा क्यों ना हो, गाँड में जड़ तक चला जाएगा बस छेद का घेरा एक बार पार होना चाहिए।

आप सोच रहें होंगे यार एक धक्का लगाओ और ठोंक दो कीला, क्यों तड़पा रहे हो अपने लंड और बेचारी गाँड को। कहीं आप का भी खड़ा तो नहीं हो गया या फिर मेरी प्यारी पाठिकाओं ने अपनी मुनिया में उँगली करनी तो शुरु नहीं कर दी? मुझे पक्का यकीन है आप की पैन्टी ज़रूर गीली हो गई है। चाहो तो देख लो।

मैंने एक उँगली उसकी चूत में डाल कर अन्दर-बाहर करनी शुरु कर दी औऱ एक हाथ से उसकी घुण्डियाँ मसलनी शुरु कर दी। उसका एक बार और झड़ना ज़रूरी था ताकि गाँड के छेद को पार करवाने में उसे कम से कम दर्द हो। ३-४ मिनट की उँगलीबाज़ी और चुचियों को मसलने से वह उत्तेजित हो गई। उसका शरीर थोड़ा सा अकड़ने लगा और वो ऊईईई.. माँ.आआ.... ओओओहहह ययाआआआआ... करने लगी। उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैंने अपनी उँगली निकाली और अपने मुँह में डाल कर एक चटकारा लिया। फिर मैंने दुबारा उँगली उसकी चूत में डाली और उसे भी चूत-रस चटाया। निशा तो मस्त ही हो गई। उसकी गाँड का छेद जल्दी-जल्दी खुलने और बन्द होने लगा था। यही समय था स्वर्ग के दूसरे द्वार को पार करने का। जैसी उसकी गाँड खुलती मेरा सुपाड़ा थोड़ा सा अन्दर सरक जाता। अब तक उसकी गाँड का छेद ५ रुपए के सिक्के जितना खुल चुका था और लगभग पौना इंच सुपाड़ा अन्दर जा चुका था, सफलतापूर्वक बिना किसी दर्द के। मैंने उसकी कमर को पकड़ा और ज़ोर का (धक्का नहीं यार) दबाव डालना चालू किया। (मुर्गी को हलाल किया जाता है झटका नहीं) गाँड अन्दर से चिकनी थी और निशा मस्त थी। गच्च से ३ इंच लण्ड घुस गया और इससे पहले कि निशा की चीख हवा में गूँजे मैंने उसका मुँह अपने दाएँ हाथ से ढँक दिया। वो थोड़ा सा कसमसाई और गूँ-गूँ करने लगी। मैं शान्त रहा। मेरा ३ इंच लण्ड अन्दर जा चुका था। अब फिसल कर बाहर नहीं आ सकता था। मुझे डर था कि चूत की तरह गाँड से भी ख़ून ना निकल जाए। लेकिन बोरोलीन और वैसलीन की चिकनाई की वज़ह से उसकी गाँड फटने से बच गई थी। इसका एक कारण और भी था मैंने लण्ड अन्दर डालते समय केवल दबाव ही दिया था धक्का नहीं मारा था।

२-३ मिनट आह... ऊहह... करने के बाद वह शान्त हो गई। मैंने अपना हाथ हटा लिया तो वह बोली "मुझे तो मार ही डाला"

"अरे मेरी मैना अब देखना तुम अपने मुँह से कहोगी और ज़ोर से ठोंको और ज़ोर से"

"हटो गन्दे बच्चे !"

अब धीरे-धीरे धक्के लगाने का समय आ गया था। मैंने अपना लण्ड अन्दर-बाहर करना शुरु कर दिया। निशा ने अपने गाँड का छेद सिकोड़ने की कोशिश की तो मैंने उसे समझाया कि वो कतई ऐसा न करे। मैंने उसे बताया कि अगर उसने गाँड को सिकोड़ तो अन्दर लंड और सुपाड़ा दोनों फूल जाएँगे और उसे अधिक तक़लीफ होगी। दोस्तों आपको पता होगा कि गाँड मरवाते समय अगर लड़की अपनी गाँड को अन्दर की ओर सिकोड़ ले जैसे मूत रोकने के लिए किया जाता है तो लण्ड और सुपाड़ा अन्दर फूल जाते हैं और फिर मोटे लण्ड से गाँड फटने को कोई नहीं रोक पाएगा।

मैंने अपना लंड जड़ तक अन्दर कर दिया. निशा तो मस्त हो गई। वो तो बस उईई... माँ.... ही करती जा रही थी, मीठी सी सीत्कार। मैं अपना लण्ड अन्दर-बाहर ही करता जा रहा था। वैसे पूछो तो गाँड का असली मज़ा तो बस ३-४ इंच तक ही होता है, उसके आगे तो पता ही नहीं चलता, आगे तो कुँआ ही होता है। निशा अब पेट के बल हो गई थी, उसने अपने दोनों पैर चौड़े कर दिए और नितम्ब ऊपर उठा दिए।...
            

कसा हुआ ब्लाउज

मैंने गोविन्द नगर में एक फ्लैट किराये पर लिया था जिसमें आगे की तरफ माकन मालिक और पीछे के रास्ते से मेरा फ्लैट था जो कि दो कमरों का अच्छा सेट था। मैं कब आऊँ, कब जाऊँ किसी को कोई मतलब नहीं था। पीछे के दरवाज़े की एक चाभी भी मेरे पास रहती थी। कभी कभी मकान मालिक का बेटा ही उस तरफ आता था जो मुझसे काफी बड़ा था। या कभी मकान मालिक अपने पोतों के साथ आते थे।

इस मकान को लेने के बाद मुझे ऐसा लगा कि गलती कर दी क्यूंकि कोई भी माल नज़र नहीं आ रहा था। कुछ एक जो थे वो काफी दूर रहते थे और कोई जुगाड़ बन नहीं रहा था। करीब डेढ़ महीने बाद एक भाभी जी करीब ३० साल की होगी, सामने के मकान में आई। उनके परिवार में ३ बच्चे और उनके पतिदेव थे। बच्चे भी ठीक ठीक उम्र के थे एक लड़की करीब १० साल की, एक लड़का ६ साल का और एक ३ साल का।

पहले कुछ दिन तो मैंने ध्यान नहीं दिया और अपने ऑफिस आता जाता रहा लेकिन एक दिन शाम को जब मैं चाय पी रहा था तो देखा कि भाभी जी छत पर खड़ी हैं और घूर घूर कर मुझे देख रही हैं। मैं थोड़ा सा झेंप गया लेकिन सोचा कि शायद नए हैं इसीलिए देख रही होंगी कि कौन कौन आस पास रहता है। पर फिर ये ही मंज़र रोज रोज होने लगा वो छत पर आती और घूरती रहती थी। वैसे मेरी और उनकी खिड़की भी लगभग आमने सामने ही थी और दरवाज़ा भी, लेकिन मेरा फ्लैट उनके फ्लैट से थोड़ा ऊंचाई पर बना था तो मैं तो आराम से देख सकता था कि उनके कमरे में क्या हो रहा है पर वो नहीं देख सकती थी। अगर मैं खिड़की पर खड़ा होता तभी नज़र आता।

उनके पति जो करीब ४४-४६ साल के थे दरअसल एक सरकारी विभाग में थे और सुबह जल्दी जाते थे और शराब के शौकीन थे इसलिए रात को देर से ही आते थे।

एक दिन मकान मालिक को कुछ काम था और उनका बेटा भी घर पर नहीं था, तो उन्होंने मुझसे कहा- बेटा तुम्हारे सामने जो नए लोग आए हैं उन्हें जरा ये सरकारी पेपर दिखा लाओ और पूछो कि इसमें क्या कर सकते है।
मैंने कहा- ठीक है !

और पेपर लेकर मैं उनके घर गया घंटी बजाई तो भाभी जी ने दरवाजा खोला और अन्दर बुलाया। मैंने भाई साहब यानि उनके पति के बारे में पूछा तो बोली कि वो तो देर से आएंगे, मैं उन्हें ही बता दूँ !

मैंने पेपर दिखा कर जानकारी ली, उन्हें जो कुछ मालूम था मुझे बताया और कहा कि मैं रात को उनके पति से मिलकर पूरी बात समझ लूँ।

मैं उठने लगा तो बोली- बैठिये न ! आप तो पड़ोसी हैं !
फिर वो चाय नाश्ता वगैरह लाई और बातें करने लगी।

वो बोली- मैं तो इतने दिनों से आपको आते जाते देखती हूँ, पर आप कभी इधर देखते ही नहीं।
मैं क्या कहता, मैंने कहा- बस अपने ही काम में व्यस्त रहता हूँ !

लेकिन अन्दर ही अन्दर मैं जानता था कि सच्चाई क्या है। दरअसल भाभी जी बड़ी सेक्सी थीं, वो हलकी सांवली इकहरे बदन की थी, साथ ही एक दम कसा हुआ ब्लाउज पहनती थी, जिससे उनके गोल गोल उभार नज़र आते थे और मेरे मकान मालिक के बेटे की नज़र भी उन पर थी। साथ ही साड़ी का पल्लू भी लटकता था जिससे सब कुछ साफ था, पर मैं चुप ही रहा।

बात बात में उन्होंने मेरा नाम पूछा और मैंने उनका !
तो उन्होंने बताया कि उनका नाम सुगंधा है और उन्होंने यह भी कहा कि मैं शाम को चाय उनके यहाँ ही पिया करूँ और उनके बच्चों को पढ़ा भी दिया करूँ !

तो मैंने कहा- पढ़ाना तो मुश्किल है क्यूंकि मेरे पास फिक्स टाइम नहीं है पर जब भी जरुरत हो बता देना, मैं आकर उन्हें मदद कर दूंगा।

धीरे धीरे वो रोज ही मिलने लगी। जब मैं शाम को ऑफिस से लौटता तो वो सड़क पर ही खड़े होकर बात करने लगती। लोगों की नज़र में भी कुछ गलत नहीं था क्यूंकि मैं अक्सर उनके बच्चो को सड़क पर ही किताब से सवाल समझा देता या वो मेरे पास आकर पूछ लेते, और मेरे और भाभी के बीच करीब ८-९ साल का अंतर भी था।

एक दिन मैं उनके घर गया तो वहां कोई नहीं था। अन्दर तक देखने पर कोई नहीं दिखा तो मैंने आवाज़ दी- भाभी जी !

फिर भी कोई जवाब नहीं आया मुझे लगा कि शायद छत पर होंगी और मैं लौटने लगा और फिर आवाज़ दी तो बोली- इधर आ जाओ ! मैं यहाँ हूँ !

मैं उस तरफ गया तो कोई नहीं दिखा। अचानक से उनके बाथरूम का दरवाज़ा खुला और मैं सकपका गया। वो बिलकुल गीले बदन नहाई हुई मेरे सामने खड़ी थी और बदन पर सिर्फ एक झीने से कपड़े की चुन्नी थी। मैं घूमने लगा तो बोली- शरमा गए क्या शर्मा जी? लगता है तुमने आज तक कोई नंगी लड़की या औरत नहीं देखी !

बात भी सच थी कि मैंने गांड तो बहुत मारी थी और नंगी लड़कियाँ किताबों और इन्टरनेट पर देखी थी पर सामने कोई नहीं।
मैंने कहा- शर्माने की ही बात है, मुझे माफ़ कीजिये, मुझे पता नहीं था, मैं बाहर इन्तज़ार कर रहा हूँ !
वो बोली- इन्तज़ार में कहीं गाड़ी न छूट जाये ! और मेरा हाथ पकड़ लिया।

उन्हें देख कर मेरे लंड से पानी चूने लगा था। वो बोली- जब मैं लड़की होकर नहीं शरमा रही, तो तुम क्यों शरमा रहे हो !

और उन्होंने मुझे अपने करीब घसीट लिया। अब मेरे और उनके बीच में सिर्फ ६ इंच की दूरी थी। सर नीचे करता तो निगाहें उनकी चुचियों पर जाती और ऊपर करता तो उनकी आँखों की हवस मुझे खाए जा रही थी। मेरा लण्ड भी तन रहा था और धीरे धीरे उनकी नाभि से टकराने लगा। उसे देख कर वो बोली- तुम शरमा रहे हो पर तुम्हारा ये नहीं शरमा रहा ! देखो कैसे मेरे बदन को सलामी दे रहा है !
और उन्होंने मेरा लंड पकड़ लिया। फिर तो ऐसा लगा कि अभी झड़ जायेगा। मैंने बड़ी मुश्किल से अपना लण्ड छुड़ाया और उनसे पूछा- आपको क्या चाहिए?

वो बोली- वही जो अभी पकड़ा था।
मैंने कहा- मेरे पास कंडोम नहीं है !

वो बोली- कोई बात नहीं, डरो मत ! मैं भी कोई ऐसी वैसी नहीं हूँ सिर्फ अपने पति से ही खुश हूँ, लेकिन तुम्हें देख कर मेरे मन में फिर से चुदाई के बादल उमड़ने घुमड़ने लगे हैं और मैं यह भी जानती हूँ कि तुम भी छुप छुप कर अपने खिड़की से मुझे देखते हो।

जब बात खुल ही गई थी तो मैंने भी कह दिया- हाँ, आप मुझे अच्छी लगती हो !
उन्होंने मुझे जोर से भींच लिया और मेरा सर झुकाकर अपनी चुचियों में दबा लिया। मैंने भी उनकी चूचियां चूसनी चालू कर दी।

तो वो बोली- यहीं करोगे या बिस्तर पर?
फिर मैं उनके बेडरूम में गया, जहाँ उन्होंने चुन्नी हटा दी और मुझे नंगा करने लगी। वैसे भी उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्यूंकि मैंने एलास्टिक वाला निक्कर और टी-शर्ट पहनी थी। उसे उतार कर उन्होंने मेरे कच्छे पर भूखी शेरनी जैसी निगाह डाली और एक ही बार में उसे नीचे कर दिया। मेरा लंड तन चुका था। उन्होंने तुंरत उसे चूसना शुरू किया और २ मिनट बाद मुझे लगा कि मैं झड़ने वाला हूँ, तभी मैंने उसे निकाल लिया।

वो बोली- क्या हुआ? फ़ुस्स हो गए क्या ?
मैंने कहा- नहीं ! हो जाऊंगा !

वो बोली- कोई बात नहीं ! मुझे मालूम है कि तुम्हारा लण्ड अभी कुंवारा है इसीलिए मैं तुम्हें प्रैक्टिस करा रही हूँ जिससे तुम्हारी बीबी को दिक्कत न हो।
वो फिर चूसने लगी और मैंने उनके मुँह में ही सारा माल टपका दिया और वो बड़े प्यार से उसे निगल गई।
अब तो मेरा पौने सात इंच का लण्ड सिकुड़ कर सिर्फ ढाई इंच का ही रह गया था तो मैं शरमाने लगा। वो बोली- शरमाओगे ही या कुछ और भी करोगे ?

मुझे लगा कि अब तो इसकी चूत का भोसड़ा बनाना ही पड़ेगा। अब यह वो वक़्त था जब मेरा गांड मारने का अनुभव काम आता।

मैंने उसकी चुचियों को चूसना शुरू किया और उनसे खेलने लगा। पहले दाईं वाली फिर बाईं वाली और कभी कभी दोनों ! चूसते दबाते करीब आधा घंटा हो गया था। उसकी दोनों चुचियाँ सांवले से लाल रंग की हो गई थी और चूचुक ऐसे लग रहे थे जैसे उनसे अभी खून टपक जायेगा। वो बोली- क्या हाल कर दिया है तुमने इनका !
मैंने कहा- सॉरी ! अभी नया नया हूँ न !

तो वो मुस्कुरा उठी और फिर मेरा लंड चूसने लगी। अब तो मेरा लंड अखाड़े में खड़े दारा सिंह जैसा हो गया था। सारी नसें खून से भरी थी और लग रहा था कि अभी शायद पौने सात से बढ़कर १५ इंच का हो जायेगा। आखिर पहली बार चूत का स्वाद जो मिल रहा था। वो मेरे लंड को मुँह में लेकर अन्दर बाहर कर रही थी। कभी कभी मैं उसका सर दबा देता तो वो उसके गले के अन्दर तक धंस जाता और वो खांसने लगती।

करीब १० मिनट बाद मैंने कहा- अब मेरी बारी !
मैंने उसकी टांगे फैलाईं और किताबों में पढ़े हुए अनुभव आजमाने लगा। उसकी चूत पर हलके हलके जीभ फिराने लगा और फिर अन्दर बाहर करने लगा। उसकी भगनासा फूल कर मोटी हो गई थी। उसकी चूत को दस मिनट तक ऐसा चूसा कि वो सूज गई और अचानक से भाभी अपनी कमर उचकाने लगी, ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे !

मैंने कहा- क्या कर रही हो ! चूसने तो दो !
वो बोली- बहुत चूस चुके, अब जरा असली काम करो !


तो मैंने अपने लंड को सहलाया और सुपाड़े के ऊपर से खाल को पीछे सरका कर उनकी चूत के मुँह पे रख दिया। उनकी चूत एक दम कुंवारी लड़की जैसी टाइट थी, वो बोली- डाल दो !
क्यूंकि अब वो बहुत गरम थी, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि वो इतनी जल्दी झड़े। मैं उनकी चूत के ऊपर अपना लंड घिसने लगा और १ मिनट बाद सिर्फ सुपाड़ा ही अन्दर सरकाया तो वो कराह उठी। मैंने कहा- तुम्हें तो अनुभव है, फिर क्यों चिल्ला रही हो?

वो बोली- करीब तीन साल से एक भी बार सेक्स नहीं किया है, जबसे छोटा बेटा हुआ है, क्यूंकि कम उम्र में ही शादी हो गई थी और तब मैं १८ साल की थी और तुम्हारे भैया करीब ३४ साल के ! गाँव की शादी थी, उन्होंने तब चोदा था जम के। फिर पहला बच्चा होने के बाद हमारे बीच में सम्बन्ध न के बराबर ही बने सिर्फ गिनती के। शराब के कारण मैं उन्हें मुँह नहीं लगाती और कभी कभी वो लंड खड़ा करने की गोली खाकर आते थे तब चुदाई होती थी। लेकिन अब जब वो करीब तीस की थी और भैया हो चुके थे। ४४-४५ के तो भैया के लंड में दम नहीं रह गया था और वो सही से खड़ा भी नहीं होता था।

मैंने कहा- सारी कहानी अभी बता दोगी या चुदवाओगी भी?
वो बोली- आराम आराम से करो !
फिर तो मैंने उस कुंवारी जैसी चूत को कुंवारा जैसा ही चोदा।

धीरे धीरे ५-७ मिनट हलके से ही सिर्फ सुपाड़ा ही अन्दर बाहर करके पहले रास्ता बनाया फिर एक हल्का झटका देकर करीब आधा लंड अन्दर किया तो उनके आँखों में संतुष्टि नज़र आई और फिर स्पीड बढ़ाई और करीब २ मिनट बाद एक ही झटके में अपनी फतह का झंडा जैसे ही उनकी चूत की जमीन पे फहराया तो उनकी आँखों से आंसू निकालने लगे, वो बोली- बाहर करो !
मैंने कहा- भाभी अब तो ये बोफोर्स तोप झंडा फहरा कर ही वापस आयेगी !
भाभी की आँखों से आंसू बह रहे थे जो उनकी चूत के कुंवारे होने का सुबूत दे रहे थे। तभी भाभी की आँखों के आंसू थमने लगे और और वो जोर जोर से सिसकियाँ लेने लगी। अचानक से उन्होंने मुझे बड़ी जोर से पकड़ा और चूत उछालने लगी और मुझसे लिपट गई।

मैंने कहा- क्या हुआ भाभी?
वो बोली- बस, अब रुक जाओ !
मैंने कहा- वो तो ठीक है लेकिन अभी तोप में गोले बाकी हैं ! इन्हें कहाँ करूँ ?
वो बोली- मेरे मुँह में कर दो !
मैंने कहा- वो तो हो चुका, अब जरा कुछ और !
वो बोली- क्या ?
तो मैंने उनकी गांड में ऊँगली डाल दी।
वो बोली- नहीं !
तो मैंने कहा- फिर मैं गुस्सा हो जाऊंगा और दोबारा फिर ये कभी नहीं होगा।

आखिर वो भी मजबूर थी और मान गई।

अब मैंने उनकी टांगे अपने कन्धों पे रक्खी और एक ही बार में पूरा लंड उनकी गांड में पेल दिया। उनकी तो गांड फट गई, वो चिल्लाने लगी जैसे मैं उनका गला दबा रहा था।
मैंने कहा- चिल्लाओ मत ! और उनका मुँह अपने हाथ से बंद किया और २-३ मिनट तक अपने लंड वैसे ही उनकी गांड में पड़े रहने दिया। फिर जब वो थोडा संभली तब मैंने फिर से चोदना शुरू किया और ३-४ मिनट में ही भाभी अपनी गांड भी चूत की ही तरह उछालने लगी।

फिर मैं भी थक गया था, स्पीड बढा दी और कुछ ही देर में मैंने उनके अन्दर अपना वीर्य छोड़ दिया। भाभी अब काफी संतुष्ट थी। फिर मैं भी अपने लंड पर इतरा रहा था और भाभी भी उसकी मर्दानगी की प्रशंसा कर रही थी।
फिर मैं घर आ गया और इसी तरह कई बार जब वो अकेले में होती तो उन्हें जमकर चोदा, कभी कुत्ते वाली स्टाइल में तो कभी ६९ पोजीशन में और जो भी उलटी सीधी पोजीशन किताबों में दिखी उसमें ! क्यूंकि वो तो मुझे प्रैक्टिस करवा रही थी और... मैं उनका शिष्य था।

  

हिला के अपनी आग बुझाता था

मेरी भाभी दीपा, जो एक सुन्दर सेक्सी लेडी हैं, की उमर २७ साल है। उनके बड़े बड़े स्तन और मोटे चूतड़ जो चलते समय इधर उधर झूलते हैं, मुझे हर वक्त बेचैन किये रहते हैं।
मेरा भाई २८ साल का है और ८ महीने पहले उसकी शादी दीपा से हुई है। वो एक बड़ी मल्टी नैशनल कम्पनी में सोफ़्टवेयर इंजीनीयर है। उसे अक्सर कम्पनी के काम से विदेश जाना पड़ता है। मै भी एक बी पी ओ में काम करता हूं और भैया भाभी के साथ रहता हूं। शुरू के महीनों में भैया भाभी ने अपनी मैरिड लाइफ़ को अच्छा एन्जोय किया। फ़िर भाभी भैया के लम्बे समय के विदेश के टूर से परेशान हो जाया करती। भैया चार महीने के लिये फ़िर गये तो मैं और भाभी दोनो ही घर मैं अकेले थे, भाभी एकदम उदास नज़र आती थी। मैं भाभी से बहुत बातें करता था और उनको खुश करने की कोशिश करता था, लेकिन ये बहत मुश्किल था। थोड़े दिन ऐसे ही बीत गये। भाभी में मैने थोड़ा चेंज नोटिस किया, मैं और भाभी अब अच्छे दोस्त बन गये थे। दोनो बाहर शोपिंग करने जाते थे, घूमते थे मज़े करते थे। जो लोग हमे नहीं जानते थे उन्हें हम दोनो पति और पत्नी लगते थे मेरे मन में भाभी के बारे में बहुत सेक्सी ख्याल थे लेकिन वो अपने बड़े भैया की वाइफ़ है ये सोच के मैं अपने आप को कंट्रोल करता था। लेकिन रात को घर में हम दोनो अकेले होते तो मेरा लंड भाभी को चोदने के इरादे से खड़ा हो जाता था और मैं अपने लंड को अपने हाथों से हिला के अपनी आग बुझाता था।

भाभी और मैं बहुत सी बातें करते थे, वो हमेशा ये जानने की कोशिश करती थी कि मेरी लडकी दोस्त है या नहीं? मैं उसे कहता था कि मेरी कोइ गर्ल फ्रेंड नहीं तो वो मानने से इंकार करती थी, वो बोलती थी कि तेरी कोइ गर्ल फ्रेंड नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता, और कहती थी लड़कियों को तेरे जैसे सुडोल सुगठित लड़के चाहिये होते हैं। आज कल भाभी ऐसे ही बातें करती थी। मैं जान गया भाभी के मन में मेरे बारे में कुछ चल रहा है। उसका मेरे साथ व्यवहार भी थोड़ा बदल गया था। बातें करते समय वो मुझे छूने की कोशिश करती थी। मेरे करीब आया करती थी। मैं बड़े मुश्किल से अपने आप को कंट्रोल करता था। भाभी अब सेक्स की कमी महसूस कर रही थी। उसकी हरकतों से ऐसे लगता था कि शी नीड्स सेक्स वेरी बेडली।

नोर्मली वो घर में साड़ी में रहती थी, साड़ी में उसकी राउंड एस देख के मेरा तो लंड हमेशा टाइट हो जाता था। उसकी नाभि, ब्लाउज़ में से दिखने वाली उसकी सेक्सी क्लीवेज में इन सबके लिये पागल हुये जा रहा था। झाड़ू कटका लगाते समय हमेशा मेरे सामने वो अपने साड़ी का पल्लु इंटेन्शनली गिराया करती थी ताकि मैं उसके बड़े बूब्स देख सकुं। शायद वो मुझे पाने के लिये पागल हुए जा रही थी। लेकिन मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं जाके भाभी को चोदना शुरु करुं। मुझे बहुत डर था।

एक दिन रात को बेडरूम मैं अपने सेक्सी भाभी के बारे में सोच कर अपना लंड हिला रहा था, मेरे रूम का डोर तो बंद था लेकिन मैने लोक नहीं किया था। तभी भाभी कुछ काम से या जानबूझ कर मेरे रूम में बिना नोक किये चली आई, और मैं अपना लंड बड़े मज़े से हिला रहा था। भाभी को देख के मैं इतना शर्मा गया, कुछ कह नहीं सका। भाभी ने भी कुछ नहीं कहा लेकिन मेरे बड़े लंड को २-३ मिनट तक देखते रही और वहा से चली गयी। अगले दिन सुबह मैं जब ओफ़िस जाने की तैयारी कर रहा था तब भाभी ने मुझे स्नैक्स और चाय दी। मैं तो रात की घटना से इतना शरमा गया था कि मैं भाभी से आंखें नहीं मिला पा रहा था। एक नज़र मैने भाभी के तरफ़ देखा तो भाभी ने मुझे शरारती इस्माइल दी, लेकिन कुछ नहीं कहा। और मैं झट से वहां से ओफ़िस के लिये निकल पड़ा।

मैं शाम को ७ बजे ओफ़िस से घर आया, भाभी ने डोर खोला उसने पिंक कलर की शीफ़ोन साड़ी और सेक्सी स्लीवलेस ब्लाउज़ पहना हुआ था। वो सेक्सी दिख रही थी . उसके ट्रांसपरेंट साड़ी मैं से उसकी सेक्सी बोडी साफ़ दिख रही थी। उसने मेरे हाथों से मेरा ओफ़िस बेग लिया और मुझे अंदर लेके डोर बंद कर दिया। और उसने मुझसे पूछा “प्यारे देवरजी, आप कल रात को क्या कर रहे थे??”

मैने कहा “ भाभी मैं कल रात को आपके बारे में सोच के अपना लंड हिला रहा था।” मैं उसी के बारे में सोच के अपना लंड हिला रहा था ये सुन के वो एकदम पागल हो गयी और मेरे पास आयी, उसने मुझे धक्का दिया और सोफ़े पे गिरा दिया। अब वो जम्प करके मेरी छाती पर बैठ गयी और बोलने लगी, “दीपेश, तुम कितने भोले हो, अपनी भाभी को चोदना चाहते हो लेकिन कभी ज़बरदस्ती नहीं की, मैं भी तुम्हारे लिये पागल हूं, मैने सोचा था कभी ना कभी आके तुम मुझे ज़रूर चोदोगे। लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। मैं तुम्हारा प्यार पाने के लिये तड़प रही हूं। तूने भाभी को बहुत तरसाया है। मुझे तुम्हारे प्यार की बहुत ज़रुरत है।” ऐसे बोल के उसने मेरे होंठों पे अपने होंठ कसके दबा दिये। १५ मिनट तक वो मेरे और मैं उसके होंठ चूसता रहा। अब मेरा भी लंड बहुत टाइट हो रहा था। होंठों के बाद वो मुझे सब जगह पे चूमने लगी। गाल छाती और सब जगह. मैं भी उसके गालों को चूसने लगा। चूस चूस के उसके गोरे गाल मैने लाल कर दिये।

अब तो वो बहुत गरम हो गयी थी उसने मेरे कपड़े निकाल दिये, और मैने उसके। अब मैं सिर्फ़ मेरे अंडरवेअर में था। और मेरे लंड का शेप साफ़ नज़र आ रहा था। वो शेप देख के वो और पागल हो गयी। और बोली “दीपेश, जब से तुम्हे अपना ये बड़ा लंड हिलाते देखा है मैं तो इसके लिये पागल सी हो गयी हूं, अब मुझे और ना तड़पाओ” ऐसे बोल के उसने मेरी अंडरवेअर निकाल दी। अब वो मेरा पूरा नंगा लंड देख के जो की अब ८” से बड़ा हो गया था अपने आप को कंट्रोल नहीं कर पा रही थी। उसने उसे अपने हाथों से हिलाना शुरु किया। और बोली “तुम्हारा तो तुम्हारे भैया से काफ़ी बड़ा है, इसलिये मैं तुम्हें कहती थी कि तुम्हारी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है क्या?? मेरे भोले देवर जी लड़कियों को ऐसे बड़े लंड वाले लड़के बहुत पसंद होते है” और वो मेरे लंड के साथ खेल रही थी।

अब उसने मेरा लंड अपने मुंह में ले लिया। मेरा लंड पहली बार किसी होल में जा रहा था। मेरे लंड को गुदगुदी सी हो रही थी। मै जैसे स्वर्ग में था।
उसने मेरा लंड पूरा अपने मुंह में ले लिया। क्योंकि यह मेरा पहली बार था, मैं ज्यादा देर नहीं टिक पाया, ५ मिनट के बाद मैने उसे कहा कि मैं छूटने जा रहा हूं, उसने कहा कि मुंह के अंदर ही छोड़ देना, और मैने बड़े फ़ोर्स के साथ अपना वीर्य उसके मुंह में निकाल दिया और उसने वो पूरा निगल भी लिया। अब छूटने की वजह से मेरा लंड फ़िर अपने नोर्मल शेप में आ गया।

तब भाभी और मैं बाथरूम में सफ़ाई के लिये चले गये। वहां वो तो और सेक्सी बातें करने लगी। लगता है अब तक उसकी गरमी ठंडी नहीं हुई थी। उसने कहा “तुम्हारे भैया का लंड तुमसे बहुत छोटा है, और वो मुझे इतना प्यार भी नहीं करते, भैया नहीं थे तो मैं सेक्स के लिये बहुत पागल हुये जा रही थी, मुझे तुम अपनी बीवी समझना और जब जी चाहे तब चोदना। ये भाभी आज से तेरी है” और उसने मुझे फिर किस करना शुरु किया। हुम एक दूसरे को फिर चूसते रहे, चूमते रहे। मैने उसे कहा “भाभी देवर को दूधू पिलाओ” उसने कहा “पूछो मत ये दूध और दूधवाली सब आप ही के लिये है, जितना दूध पीना है पी लो” और मैने बिना रुके उसके ३६ डी साइज़ के सेक्सी बूब्स दबाने लगा। उसे ज़ोरो से चूसने लगा, वो चीखने लगी, चूसो और ज़ोरों से, पी जाओ सारा, दीपेश आआआआअ आईईइ ईइ अ दूध ऊऊऊह ह्हह्हा आऐइ ईई ईई……ऊऊ ऊऊओ ऊऊओ ऊओ ऊ…आ आआअ आ आअ।

मैने अपनी चुसाई शुरु रखी, और वो मेरे लंड से खेले जा रही थी। २० मिनट मैने उसके बूब्स चूस चूस के लाल कर दिये, अब मेरा लंड फ़िर टाइट हो रहा था। अब तो मेरे लंड को उसके चूत के होल में जाना था। मेरा टाइट लंड मैने उसके चूत पर प्रेस किया। मेरा लंड मोटा होने के कारण अंदर जाने में थोड़ी प्रोब्लम हुआ। लेकिन २-३ हार्ड पुश के बाद अंदर गया। तब वो चिल्लाई आआअ आआअ आऐइ ईईईइ ऐईईइऊ ऊऊऊईइ ईईईई माआ आआआ निकालो बहुत दर्द हो रहा है, लेकिन वो उसे अलग नहीं होने दे रही थी। उसे भी बहुत मज़े आ रहे थे। मेरा लंड भी बहुत मज़ा कर रहा था। माउथ फ़किंग से चूत चुदवाना अच्छा लग रहा था। मैने उसे लगभग २० मिनट तक चोदा और उसके चूत में पानी निकाल दिया, उसी टाइम पे उसके भी चूत से पानी निकला।

फिर हम दोनो बाथरूम में एक साथ शोवर में नहाये, वहां भी मैने थोड़ी मस्ती की। ओफ़िस से घर आने के बाद ७.०० से लेके ९.३० तक चुदाई का ही प्रोग्राम चलता रहा। उस रात को हम दोनो एक ही बेड पे सोये थे एक दूसरे के बाहों में हब्बी & वाइफ़ की तरह। मेरी सेक्सी भाभी के बदन की आग ठंडी हो ही नहीं रही थी। सुबह ५.३० को वो फ़िर से मेरे लंड के साथ खेलने लगी मैं तब नींद में था। लेकिन उसके मस्ती से मैं उठ गया और मेरा लंड भी उठ गया। और फिर १ बार मस्त चुदाई हुई

 

मन मुराद पूरी हो गई

भाभी मुझसे लगभग बारह साल बड़ी थी। मैं उस समय कोई १८-१९ साल का था। घर पर सभी मुझे बाबू कह कर बुलाते थे। भाभी की तेज नजरें मुझ पर थी। वो मेरे आगे कुछ ना कुछ ऐसा करती थी कि मेरा लण्ड खड़ा हो जाता था। वो शरीर में भरी पूरी थी और बदन गदराया हुआ था। उनके सुडौल स्तन बहुत ही मनमोहक थे और थोड़े भारी थे। मुझे भाभी के बोबे और मटके जैसे चूतड़ बहुत अच्छे लगते थे। मेरी कमजोरी भी यही थी कि जरा से भाभी की चूंचिया हिली या चुतड़ लचके, बस मैं उत्तेजित हो जाता था और लण्ड को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता था। भाभी को भी ये बात शायद मालूम हो गई थी कि उनके कोई भी एक्शन से मेरा बुरा हाल हो जाता था।
आज भी कमरे में सफ़ाई कर रही थी वो। उसके झुकते ही उसके बोबे झूल जाते थे, और मैं उन्हें देखने में मगन हो जाता था। वो जान कर कर के उन्हें और हिलाती थी। मुझे वो तिरछी नजरो से देख कर मुस्कराती थी, कि आज तीर लगा कि नहीं। वो अपने गोल मटोल चूतड़ मेरी तरफ़ करके हिलाती थी और मुझे अन्दर तक हिला देती थी। आज घर पर कोई नहीं था, सो मेरी हिम्मत बढ़ गई। सोचा कि अगर भाभी नाराज हुई तो तुरंत सॉरी कह दूगा। मैं कम्प्यूटर पर बैठा हुआ कुछ देर तक तो उनकी गोल गोल गाण्ड देखता रहा। बस ऐसा लग रहा था कि उनका पेटीकोट उठा कर बस लण्ड गाण्ड में घुसा दूँ। बस मन डोल गया और मैंने आखिर हिम्मत कर ही दी।
"बाबू, क्या देख रहे हो ?"
"भाभी, बस यूँ ही.... आप अच्छी लगती हैं !"
वो मेरे पास आ गई और सफ़ाई के लिये मुझे हटाया। मैं खड़ा हो गया। अचानक ही मेरे में उबाल आ गया और मैं भाभी की पीठ से चिपक गया और लण्ड चूतड़ों पर गड़ा दिया। भाभी ने भी जान कर करके अपने चूतड़ मेरे लण्ड से भिड़ा दिया। पर उनके नखरे मेरी जान निकाल रहे थे।
"बाबू, हाय ! क्या कर रहा है !"
"भाभी अब नहीं रहा जा रहा है" भाभी ने अपनी गाण्ड में लण्ड घुसता मह्सूस किया और लगा कि उसकी इच्छा पूरी हो रही है। वो पलटी और और मुझे अपनी बाहों में कस लिया और अपनी भारी चूंचियाँ मेरे शरीर से रगड़ दी।
"हाय, पहले क्यूँ नहीं किया ये सब?" और मुझे बेतहाशा चूमने लगी। मुझे भी साफ़ रास्ता मिल गया। मेरी हिम्मत ने काम बना दिया।
"आप इशारा तो करती, मेरा तो लण्ड आपको देखते ही फ़ड़क उठता था, लगता था कि आपको नंगी कर डालू, लण्ड घुसा कर अपना पानी निकाल दूँ !"
"कर डाल ना नंगी, मेरे दिल की निकाल दे, मुझे भी अपने नया ताजा लण्ड का स्वाद चखा दे रे !" भाभी का बदन चुदने के लिये बेताब हो उठा था।
"भाभी, तुम कितनी मस्त लग रही हो, अब चुदा लो ना, मेरा लण्ड देखो, निकालो तो सही बाहर, मसल डालो भाभी, घुसा डालो अपनी चूत में !" मेरा लण्ड तन्ना उठा था।
"बस बिस्तर पर आजा और चढ़ जा मेरे ऊपर, मुझे स्वर्ग में पहुंचा दे, बाबू चोद दे मुझे.... " भाभी चुदने के लिये मचल उठी।
भाभी मुझसे ज्यादा ताकतवर थी। मुझे खींच कर मेरे बिस्तर पर लेट गई।
"पेटीकोट ऊपर कर दे, चाट ले मेरी चूत को !" हा बाबू.... जल्दी कर, फिर चूत की बारी भी आनी चाहिये ना !" भाभी की भी तड़प देखते ही बनती थी, कितनी बेताब थी चुदाने को।
मैंने अपने लण्ड पर चिकनाई लगाई और उसकी गाण्ड पर भी लगा दी और चिकना लण्ड का मिलाप चिकने छेद से हो गया। मैंने उसके झूलते हुए स्तन थाम लिये, और उन्हें मसलना शुरू कर दिया। फिर दोनों ने अपना अपना जोर लगाया और भाभी के मुख से हाय की सिसकारी निकल पड़ी। चिकना लण्ड था इसलिये अन्दर सरकता चला गया।
"हाय रे मजा आ गया, तेरा मोटा है उनसे .... चल और लगा !"
"दर्द नहीं हुआ भाभी.... "
"नहीं मेरी गाण्ड सुन्दर है न, वो भी अक्सर पेल देते हैं, आदत है मुझे गाण्ड मरवाने की !"
"तो ये लो फिर.... मस्त चुदो !" मैंने स्पीड बढ़ा दी, उसकी गाण्ड सच में नरम थी और मजा आ रहा था। भाभी ने भी अपनी मस्त गाण्ड आगे पीछे घुमानी शुरू कर दी। उसके गोल-गोल चूतड़ो के उभार चमक रहे थे। उसकी दरारें गजब ढा रही थी। लटके हुए बोबे मेरे हाथ में मचल रहे थे। उसके निपल काले और बड़े थे, बहुत कड़े हो रहे थे। निपल खींचते ही उसे और मजा आता था और सिसक उठती थी।
"हाय रे भाभी , रोज़ चुदा लिया करो, क्या मस्ती आती है !" मेरे झटके बढ़ चले थे।
"तेरे लण्ड में भी जोर है, जो अभी तक छूटा नहीं, चोदे जा.... मस्ती से.... मुझे भी लगे कि मैं आज चुद गई हूं !" भाभी मस्त हो उठी। भाभी के मुख से सीत्कारें निकल रही थी।
"मस्त गाण्ड है भाभी, रोज गाण्ड देख कर मुठ मारता था, आज तो बस.... गाण्ड मार ही दी !"
"मन की कर ली ना, बस.... अब बस कर.... कल चोद लेना.... मेरी चूत पेल दे अब !" भाभी ने पीछे मुड़ कर नशीली आंखो से देखा।
मैंने अपना लण्ड ग़ाण्ड से निकाला और पहले उसकी गीली चूत को तौलिये से पोंछ डाला, उसे सुखा कर लण्ड को चूत में दबा दिया। सूखी चूत में रगड़ता हुआ लण्ड भीतर बैठ गया।
"अरे वाह्.... मजा आ गया, कैसा फ़ंसता हुआ गया है !" भाभी हाय कह कर सिसक उठी।
मुझे उनकी चूत में घुसा कर मजा आ गया। मैंने उसकी कमर पकड़ कर लण्ड का पूरा जोर लगा दिया। मुझे फिर भी चूत ढीली लगी। मेरे धक्के ऐसा लग रहा था कि किसी नरम से स्पंज से टकरा रहे हैं।
"हाँ भाभी, चूत तो कितनी नरम है, गरम है, आनन्द आ गया !"
उसने अपनी चूत और बाहर निकाल ली और चेहरा तकिये से लगा लिया। पर मुझे कुछ ठीक नहीं लगा। मैंने उसे धक्का दे कर चित्त लेटा लिया और उनकी टांगें अपने कन्धों पर रख ली और चूत के निकट बैठ कर लण्ड चूत में डाल दिया। भाभी ने मुझे पूरा अपने ऊपर खींच लिया और अपनी टांगो के बीच में भींच लिया। मैं उनके बोबे पकड़ते हुए उस पर लेट गया। लण्ड चूत की गहराइयों को बींधता चला गया। उसे शायद पता चल गया था कि उसकी चूत टाईट नहीं है, सो उसने अपनी चूत क कसाव बढ़ा दिया और चूत सिकोड़ ली। मेरी कमर अब जोर से चल पड़ी। चूत कसने से पहले तो वो दर्द से कुलबुलाई, फिर सहज हो गई"जड़ तक चला गया, साला, तेरा सच में थोड़ा बड़ा है, मजा बहुत आ रहा है !"
उसकी कमर भी अब हौले हौले चलने लगी, मेरा पूरा लण्ड खाने लगी। दोनों की कमर साथ साथ चलने लगी। मैं भी उनकी लय में लय मिलाने लगा। लण्ड में एक सुहानी सी मीठी सी मस्ती चलने लगी। कुछ देर के बाद कमर की लय तोड़ते हुए भाभी ने मुझे दबा कर नीचे कर दिया और खुद मेरे ऊपर चढ़ गई और तेजी से धक्के मारने लगी और उसके मुँह से तेज सीत्कारें निकलने लगी।

"साले बाबू.... मर गई, तेरी तो.... भेन चोद .... मैं गई.... आईईईइ ओह्ह्ह्ह्ह। .... बाबूऽऽऽ.... मर गई.... !" कहते हुए वो मेरे से चिपक गई। और चूत का जोर मेरे लण्ड पर लगाने लगी। बार बार चूत दबा रही थी। अचानक उसकी चूत टाईट हो गई और मैं तड़प गया और मेरा वीर्य निकल पडा। और वो निढाल हो कर मुझे पर पसर गई। मैं नीचे से जोर लगा कर उसकी चूत में वीर्य निकाल रहा था। वो भी चूत को हल्का हल्का कस कर पानी निकाल रही थी। मेरे लण्ड पर उसका कसाव और छोड़ना महसूस हो रहा था। कुछ ही देर में हम अलग अलग पड़े हुए गहरी सांसे भर रहे थे।

“भाभी, आप तो मस्त है, कैसी बढ़िया चुदाई करती हैं, मेरी तो माँ चोद दी आपने !”
भाभी ने तुरन्त मेरे मुँह पर अंगुली रख दी, “नहीं गाली नही, मस्ती लो पर गाली मत देना भेन चोद !” भाभी ने मुझे फिर से एक बार और दबा लिया, और हंस पड़ी।

“चल हो जाये एक दौर और .... अब तू मेरी माँ चोद दे, भेन के लौड़े.... !” और उसकी चूत का दबाव मेरे लण्ड पर बढने लगा। जिस्म फिर से पिघलने लगे .... भाभी का मस्त बदन एक बार फिर वासना से भर उठा था.

तुझे संतुष्ट करना मुश्किल है

मेरे घर में मै माँ और पिताजी ही थे..मेरी उमर उस समय २५ साल की थी मेरा लंड ७.५ लंबा और २.५ इंच मोटा है..लेकिन मुझे सेक्स का कोई अनुभव नही था..हाँ मूठ मार लेता था..

मै इंजीनियरिंग कर चुका था और अभी नौकरी के लिए प्रयत्न कर रहा था. एक दिन , सुबह ७:०० ऍम पर मै जब उठा और बाथरूम जा रहा था की घर की दरवाजे की घंटी बजी..खोल के देखा तो मेरी मौसी का लड़का रमेश और उसकी बीवी रचना आए है.

माँ ने तुरंत देखा और कहा आओ आओ दोनों ने अपना समान अन्दर रखा और माँ को प्रणाम किया थोड़ी देर कुछ बात करने के बाद भाभी तुरंत किचेन में माँ के साथ काम करने लगी पिताजी बाथरूम से निकले और कपड़े पहन कर काम पर जाने के लिए तैयार हो गए..

तब रमेश और भाभी ने पिताजी को भी प्रणाम किया सबने मिल कर नाश्ता किया.फ़िर रमेश ने कहा की गाव में उसका कोई काम नही चल रहा है और घर की हालत ख़राब होती जा रही है इसलिए मौसी ने कहा है की शहर में जाकर कोई काम ढून्ढो...जब तक रहने का इंतज़ाम नही होता तब तक यहाँ रुकेंगे..

अगर माँ पिताजी चाहे तो..माँ पिताजी दोनों ने कहा कोई बात नही..हमारा घर बड़ा है..एक कमरा उन्हें दे दिया मेरे बाजू वाला...और कहा पहले नौकरी देखो बाद में घर दूंढ लेना..नाश्ता करने के बा???

रमेश भी फ्रेश होकर नौकरी की तलाश में निकल गया. . रमेश के जाने के बाद भाभी माँ के साथ घर के काम में लग गई मै स्नान करने बाथरूम में गया और तैयार होकर बाहर आया.

भाभी मेरे साथ थोड़ी देर बैठ कर बाते करने लगी..थोड़ी देर में हमारी अच्छी दोस्ती हो गई..भाभी का रंग गोरा था.और चुन्चिया एकदम कसी हुयी..पतली कमर...गोल उभरी हुई गांड....कुल मिलाकर भाभी एक चोदने की चीज़ थी..लेकिन अभी मेरे दिमाग में ऐसा कुछ नही आया . मुझसे बात करते हुए वो काम भी कर रही थी.

शाम को रमेश वापस आया..उसे एक नौकरी मिल गई थी किसी लेथ मशीन पर.वो लेथ मशीन का ओपेरटर था..और उसकी तनख्वाह थी २०० रुपये रोज की. . दो दिन ऐसे ही बीत गए..मै उनके कमरे के बाजु वाले कमरे में ही सोता हु..दोनों कमरों के बीच की दीवार ऊपर से खुली है..

रात को दोनों के बीच झगड़ा होता था...भाभी की आवाज़ मैंने सुनी...तुम फ़िर से झड़ गए..मेरा तो कुछ हुआ ही नही...फ़िर से करो ना..लेकिन रमेश कहता था.तेरी चूत कोई घोडा भी चोदेगा तो ठंडी नही होगी..मुझे स???ने दे..ऐसा दो रात हुआ..भाभी उठ कर बाथरूम जाती थी फ़िर बड़बढ़ाते हुए वापस आ कर सो जाती थी.. भैय्या कहते थे..तू बहुत चुदासी है..तुझे संतुष्ट करना मुश्किल है..ख़ुद ही अपने हाथ से आग बुझा ले..

तीसरे दिन , पापा और रमेश नाश्ता करके अपने काम पर चले गए मै लेता था..भाभी मेरे कमरे में आई और कहा की नाश्ता करने चलो..माँ शायद बाथरूम में थी..मैंने किचेन में जा कर नाश्ता करना शुरू किया.भाभी मेरे एकदम से क़रीब आई और बड़े प्यार से बोली संजय..एक बात पूंछू ? मैंने कहा पूंछो ..भाभी बोली "किसी से बताओगे तो नही?" मैंने पूंछा ऐसी कौनसी बात है?और आप तो जानती हो मै चुगली नही करता. . भाभी फिर से बोली मै जानती हु लेकिन आप प्रोमिस दो आप किसी को नही बताएँगे मैंने कहा हाँ मै प्रोमिस देता हु..

तब भाभी ने धीरे से कहा मेरे और तुम्हारे भैय्या के लिए कोक शास्त्र ला दो., मैंने पूंछा ..क्यो? भाभी ने कहा तुम्हारे भाई को औरत की कैसे चुदाई की जाती है वो सीखना पड़ेगा वो मुझे संतुष्ट नही कर पता. मै ने कहा ठीक है मै ला दूंगा मै सुबह मार्केट में गया और एक बुक स्टोर से अच्छा कोक शास्त्र और दो चुदाई की कहानी की पुस्तक ले आया.

घर आकर मैं ने चुदाई की पुस्तके पढी..मेरा लंड खड़ा हो गया..मैंने मूठ मारी..और पहली बार मुझे भाभी को चोदने का ख़्याल आया. कोक शास्त्र में चुदाई की कई तस्वीरे थी..फ़िर मैंने भाभी को तीनो पुस्तके दे दोपहर का खाना खाने के बाद भाभी वो पुस्त ले कर अपने कमरे में चली गई..

पुस्तक पढते हुये वो गरम हो गई..मैंने दरवाजे से देखा वो अपने चूत में हाथ दल के मसल रही थी.. रात को डिनर के बाद १० :३० बजे सब अपने बेडरूम में सोने गए मै ड्राइंग रूम में बैठ कर भाभी और रमेश भाई जो बात कर रहे थे वो सुन रहा था , रमेश ने भाभी की चुदाई की लेकिन उसे संतुष्ट नही कर सका और रोज की तरह जल्दी ही झड़ गया....
भाभी उसे समझाने की कोशिश कर रही थी लेकिन वो सुनता ही नही था उसने कहा मुझसे फालतू बात मत कर तू कभी भी संतुष्ट नही होगी , अखिर में भाभी रूम से बाहर निकली और बाथरूम में गयी ,

बाथरूम से जब वापस आयी तब मैंने भाभी को रोका और भाभी का एक हाथ पकड़ के मेरे गरम लंडपर रख दिया , भाभी में मेरे लंड पर प्यार से हाथ फेरा और बोली ये तो बहुत बड़ा लंड है ..मैंने कहा जब लंड बड़ा और मज़बूत होगा तभी ज्यादा मजा भी आयेगा..

भाभी बोली लगता है एही सच है..लेकिन ये तो मेरी चूत फाड़ देगा भाभी ने कहा आप मूठ मत मरना संजू भाई मै रमेश के सोने के बाद तुमसे चुदाने आऊंगी , ये कह कर मेरे लंड को दबा के वो अपने रूम में चली गई.., जाते ही रमेश बोला यह दूध में शक्कर डाला ही नही है जाके शक्कर मिला के लाओ. भाभी बिना कुछ कहे वो दूध लेके बाहर आयी, और मुझे इशारे से किचेन में बुलाया..मै उनके पीछे किचेन में गया, भाभी धीरे से बोली कोई नींद की गोली है?मैंने कहा बहोत सी है , ममी पहेले लेती थी , मैंने दो गोली निकल के दी भाभी ने दोनों गोली पीस के दूध में डाली और शक्कर डाली फिर चम्मच से हिला के दूध तैयार किया ,

फिर वो बोली मुझे तुम्हारा लंड दिखाओ मैंने पाजामे से लंड बाहर निकला और भाभी के हाथ में दिया...भाभी उसे देख कर हैरान हो गई और बोली..बाप रे इतना लंबा और इतना मोटा..कितना सलोना और तगडा है आज मुझे इस लंड से चुदाना ही है..तुम आज मेरी चूत फाड़ दोगे...मेरा ७.५ इंच लंबा और २.५ इंच मोटा लंड उन्होंने हाथ में ले करा सहलायऍ ? , फ़िर कहा..आज मुझे पूरी औरत बना देना वैसा बोलके दूध अपने साथ लेके वो बेडरूम में चली गयी .

मै अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया और भाभी का इंतज़ार करने लगा..मेरा लंड भी बेताब हो गया था..मैंने पुस्तक में जैसा पढ़ा था और जो चुदाई की स्टाइल के तस्वीर देखी थी उन्हें याद करने लगा रात को डिनर के बाद १०:३० बजे सब अपने बेडरूम में सोने गए

मै ड्राइंग रूम मेंबैठ कर भइया भाभी की चुदाई के मजे ले रहा था..आज भी रमेश जल्दी ही झड़ गया. मै बाहर बैठा सब सुन रहा था..भाभी ने उसे समझाया..लेकिन उनके बीच कहा सुनी होने लगी भाभी संतुष्ट नही हुयी.. भाभी उसे समझाने की कोशिश कर रही थी लेकिन वो सुनता ही नही था, अपनी गलती मान ही नही रहा था.

आखिर में भाभी रूम से बाहर निकली और बाथरूम में गयी, अपनी चूत को साफ किया और फ़िर पनि साड़ी से चूत को पोंछते हुए , बाथरूम से जब वापस आयी तब मैंने हिम्मत कर के उन्हें रोका और भाभी का एक हाथ पकड़ के मेरे गरम लंड पर रखा., भाभी के खप से उसे पकड़ा और फ़िर प्यार से उस पर हाथ फेरने लगी और बोली यह तो बहुत बड़ा लंड है

मैंने कहा बड़ा ही नही मजबूत भी है..तुम्हे संतुष्ट कर सकता है..बड़े और मोटे लंड से ही चुदाई का असली मज़ा आता है., भाभी बोली शायद यही सच है.तुम क्या कर रहे हो..मैंने कहा मूठ मार रहा ऊँ..भाभी बोली मत मारो मै अभी रमेश के सोने के बाद तुमसे चुदवाने आऊंगी., ये कह कर वो मेरे लंड को थपथपा के जाने लगी..मैंने उनकी चुन्ची को दबा दिया..वो उईई.कर उठी..और फुसफुसाके बोली..थोड़ा सब्र करो..सब दूंगी..राज्जा..पूरी नंगी होके चुदवाऊन्गी और वो अपने कमरे में चली गई.. जाते ही रमेश बोला यह दूध में शक्कर डाला ही नही है जाके शक्कर मिला के ले आओ .

भाभी बिना कुछ कहे वो दूध लेके बाहर आयी और मुझे इशारा कर के किचेन में बुलाया..मै उनके पीछे उनकी गांड से मेरा खड़ा लंड टिका के खड़ा हो गया..उन्होंने भी मेरे लंड पर अपनी गांड और चिपका दी..फ़िर बोली कोई नींद की गोली है ?मैंने कहा बहुत है.. ममी पहले लेती थी मैंने दो गोली निकाल के दी भाभी ने दोनों गोली पीस के दूध में डाली और शक्कर डाल के फ़िर चम्मच से हिला के दूध तैयार किया फ़िर वो बोली मुझे तुम्हारा लंड दिखाओ , मैंने अपना पाजामा खोला और अपना मूसल बाहर निकला..उसक् ? सुपाडे के छेद से अब पानी निकल रहा था. उसने अब उसे हाथ में लिया..बाप रे ये तो दुगुना लंबा और मोटा है..

मेरा ७.५ इंच लंबा और २.५ इंच मोटा लंड हाथ में लेने की कोशिश की..और कहा कितना सलोना है..और कितना तगड़ा है बहुत मोटा है ये..मेरी चूत फाड़ डालेगा..और झुक के मेरे लंड को चूमा और कहा मेरा इंतज़ार करो ऐसा बोल के दूध अपने साथ ले के वो बेडरूम में चली गयी...
मै अपने बेड पर आ के पाजामा खोल के सो गया..लंड को मै सहला रहा करीब २० मिनिट के बाद भाभी बेडरूम का दरवाजा खोल के मेरे रूम मे आई उसने आते ही मुझसे कहा संजय आज मेरी पूरी प्यास बुझा दो मेरी चूत को तुम्हारे मोटे लंड से तृप्त कर दो..मैंने भाभी को अपने बिस्तर पर मेरे ऊपर खीच लिया मै तो नंगा ही था, भाभी ने मेरे लंड को महसूस किया मै उन्हें चूमने लगा. उन्होंने फूस फुसते हुए कहा..इतना मोटा लंड मेरी चूत मे धीरे धीरे डालना संजू. मै उन्हें चूमते हुए उनका ब्लाउज खोलने लगा.अंडा ब्रा ऍ ?ही पहना था शायद रमेश से चुदवाते हुए वो पहले ही खोल चुकी थी..मैंने उनकी साड़ी भी खोल के नीचे फेंक दिया..अब सिर्फ़ पेटीकोट मे थी वो..कितनी गोरी थी..मै उन्हें चूमे जा रहा था और चुन्चिया मेरे हाथो मे थे..मस्त नरम मख्खन जैसी चुन्चिया थी..मैंने उनके पेट को सहलाते हुए नीचे चूत पर हाथ लगाया उफ़ लगा जैसे आग लगी है मैंने उनके चूची को आटा गूंथने जैसे मसला वो आह..ओह्ह.. कर रही थी लेकिन बहुत धीरे...फ़िर मैंने उनका पेटीकोट का नाडा खोल दिया और उसे नीचे खीच दिया..चड्डी भी नही थी..मैंने भाभी को मेरे बेड परलिटा दिया उफ़ क्या छोट थी पुस्तक मे कुंवारी लड़की की जैसी चूत थी ठीक वैसी ही चूत की दरार थी..मै तो पागल होने लगा..झुक कर चूत को चूमा..चूत गीली थी..मैंने दाने को ढूंढा उसे मसल दिया भाभी ऑफ़ कर उठी..फ़िर एक ऊँगली गीली चूत मे दाल दी..बहुत टाईट थी चूत..मेरी ऊँगली भी मुश्किल से जा रही थी..भाभी ने कहा अब मुझे पहले तुम्हारे लंड से च ोद दो.. .मैंने उन्हें और तडपाने के लिए अब मेरी जीभ चूत पर लगा दी और चूसने लगा अब भाभी बेचैन हो गई..अहह संजय..क्या कर रहे हो..आह्ह..इश..ओ माँ और जीभ चूत पर लगाने से उनकी चूत से और पानी निकलने लगा ..उन्होंने कहा पहले एक बार इस लंड को अन्दर दाल के चोद डालो..फ़िर बाद मे जो चाहे करना..मैंने कहा ठीक है..और मै उनके पैरों के बीच बैठ गया.मैंने देखा उनकी चूत का सूराख बहूत छोटा है..पास ही टेबल पर फेयर न लवली करें का नया ट्यूब था उसे मेरे लंड पर अच्छे से लगाया..और ऊँगली से भाभी के सूराख पर भी.., भाभी ने अपने पैर अच्छे से फैला दिए मैंने अपना लंड चूत पर रखा..भाभी ने तुरंत लंड हाथ मे पकड़ लिया और अपनी चूत पे रगड़ने लगी , थोड़ी देर के बाद मेरे लंड का सुपाडाअपने चूत के गुलाबी छेद पर रखा और फूसफुसाके बोली संजू ये इतना मोटा है तुम मेरी चूत का ख़्याल रखना..एकदम आहिस्ता आहिस्ता अन्दर डालो..मेरी चूत फाड़ मत देना...ये सुनकर मै और जोश म् ? आ गया..फ़िर भी मैंने लंड के सुपाड़े को अन्दर धकेला..और भाभी..उईई..माँ...कर के उछल पड़ी मैंने अब लंड को धीरे धीरे अन्दर घुसाने लगा लेकिन चूत बहुत टाईट थी..मैंने थोड़ा जोर लगाया और चुन्ची दबा के धक्का दिया आधा लंड अन्दर घुस गया और भाभी उछल पड़ी..मैंने देखा चूत से थोड़ा खून निकल आया..मै डर गया..मैंने पूंछा भाभी ज्यादा दर्द हो रहा है क्या.
भाभी ने कहा तुम फिकर मत करो अन्दर डालो पूरा..आह्ह मजा आ रहा है..लेकिन भाभी के चेहरे पर दर्द दिख रहा था..मैंने आधे घुसे लंड को अन्दर बाहर करना शुरू किया.थोड़ी देर में भाभी ने कहा और तेज ..और तेज.आह..और मै जोश में आ गया.मैंने लंड को बाहर खीचा और पुरी ताकत से अन्दर दाल दिया और इस बार भाभी जोर से चीखने जा रही थी लेकिन अपने ही हाथो को मुँह में डाला और काट लिया उनकी कलाई से खून निकल आया लेकिन वो अब कमर उछालने लगी थीं मुझे चिपक रही थीं..आह..ऊह्ह....संजू..मै आने वाली हूँ..और जोर से..और...और फ़िर उन्होंने दो टिन झटके मारे और मुझसे चिपक गई..उनका पूरा बदन कांप रहा था पसीना निकल आया था और मेरे लंड पर भी बहुत गरम गरम लगा..उनका पानी..उन्होंने मेरा चुम्मा लिया और कहा....आज मेरी चूत पहली बार झड़ी है जिंदगी में..अब तुम जैसे चाहो चोदो मुझे..मैंने कहा तुम्हारी चूत से खून भी निकला है..उन्होंने कहा ..सच्च...मैंने अपना लंड निकल कर दिखाया..जो की लाल हो रहा था..वो मुझसे और जोर से लिपटी और कहा आज ही मै सही मायने में औरत बनी हूँ.. भाभी ने जिस तरह से चूत को झटके दिए उससे मै तो घबरा गया था..मै उनसे कुछ पूछने जा रहा था उन्होंने मेरा मुह हाथ से बंद किया और मेरा लंड वापस चूत में डालने का इशारा किया इस बार मैंने लंड को एक झटके में अन्दर डाला..भाही ने फ़िर से कमर उछालना शुरू किया..शायद अभी पूरी झड़ी नही थी..मेरे लंड को चूत में कस लिया मै उनकी चूची चूसते हुए जोर से झटके मारने लगा“ भाभी ने कहा संजय..बहुत मज़ा आया रहा है..तुम सच में अच्छा चोदते हो..और तुम्हारा ये मजबूत लंड आः..अब मुझे भी मेरे लंड में से कुछ निकलेगा ऐसा महसूस हो रहा था..लंड और कड़क हो के फुल रहा था..
मैंने अब धक्को की स्पीड बड़ा दी मेरे धक्को से भाभी की चुचिया उछल रही थी..और ७-८ धक्को के बाद मैंने लंड को चूत की गहराई में पेल दिया और मेरे लंड से पिचकारियाँ निकलने लगी..एक निकली..दुसरी निकली..तीसरी..चौथी...और ऐसे क़रीब ७-८ मोटी धार की पिचकारी से भाभी की चूत पूरी भर गयी..मै उनके ऊपर ल???ट गया..

वो मेरे बालों में हाथ फेरने लगी..फ़िर हमने एक दुसरे के होठों को बहुत जोर से चूमा.. ,क़रीब ५ मिनिट के बाद भाभी ने कहा अब लंड को बाहर निकाल लो..मै उठा और लुंड जो अभी भी आधा खड़ा था..उसे बाहर निकाला..पक्क की एक आवाज़ हुयी..और भाभी की चूत से मेरा लावा और खून दोनों बह कर चादर पर गिरने लगे , मैंने देखा पहले जो चूत सिर्फ़ एक पतली दरार दिख रही थी अब वो अंग्रेज़ी के "ओ" जैसी दिखने लगी थी , मैंने सोचा भाभी को अब रमेश का लंड बहुत ही छोटा लगेगा.

भाभी ने उठाते हुए आह्ह की आवाज़ की..मैंने अहिस्ता पूंछा क्या हुआ..उन्होंने कहा चूत चरपरा रही है.. मैंने उनका हाथ पकड़ कर खड़ा किया .. उसके बाद हम दोनों बाथरूम में गए..भाभी और मै दोनों नंगे ही थे.. बाथरूम में भाभी चूत साफ करने बैठी तो मैंने देखा और भी बहुत सा माल उनकी चूत से निकला..उन्होंने कहा..कितना माल निकाला है..

रमेश का तो एक चम्मच ही गिरता है...ये तो क़रीब १० चम्मच है..फ़िर उन् होंने मेरे लंड को साबुन लगा के धोया..लंड फ़िर खड़ा होने लगा..मैंने कहा भाभी और एक बार...भाभी ने कहा..देखते है..फ़िर हम दोनों बेद पर आ कर लेट गए नंगे..और सो गए..

थोड़ी देर मैंने उनकी चूची मसली चुम्बन किया..उनकी चूत सह्लायी..भाभी भी मेरे लंड को सहला रही थी.. एक घंटे के बाद फिरसे मेरा लंड खड़ा हुआ अब मैंने भाभी को जगाने लगा.. वो जाग गई

थोड़ी देर चुम्बन के बाद मैंने भाभी से कहा..मेरा लंड चुसो न..उसने पहले मना किया फ़िर किस किया..मैंने भाभी को कहा चाटो..उन्होंने चाटना शुरू किया मैंने कहा सुपाडे को मुह में लो..,उसने कोशिश की..लेकिन पूरा नही ले पा रही थी....मैंने भाभी से कहा तुम अपनी चूत मेरे मुँह के ऊपर रखो..वो दोनों पैर फैला के मेरे मुह पर बैठ गई..मैंने उन्हें कहा मेरे लंड को झुक के मुँह में लो..उसने किया..और इस तरह चूत चटवाते हुए क़रीब १२-१३ मिनिट में वो उह.. आह्ह..और जोर से चाटो..जीभ मेरे अन्दर तक डाल दो..आह्ह..उनकी चूत से पानी निकल के मेरे गले और चहरे पर बहने लगा था..

मै उनकी कुंवारी गांड के छेद को ऊँगली से टटोल रहा था..और भाभी..आह्ह..मेरा होने वाला है..संजय..पूरी जीभ अन्दर डालो..और भाभी ने चूत मेरे मुँह पर दबा दी और झटके मारने लगी..इस बार उन्होंने अपने चूत के पानी से म???रा पूरा मुह भिगो दिया...और बदन ऐँठ कर शांत हो गई..

थोड़ा चूसने के बाद मैंने भाभी को चार पाया बनाया और पिछे से चूत में लंड डाला...इस बार क़रीब ३० मिनिट से ज्यादा मैंने भाभी को चोदा..वो बिस्तर पर पेट के बल लेट गई..लेकिन मै चोदता रहा..

इस दौरान भाभी और ३ बार झड़ी..फ़िर मै पीछे से ही भाभी की चूत में झड़ गया.. और उनके पीठ के ऊपर लेट गया और सामने हाथ डाल कर चूची दबाता रहा.

इस तरह आधा घंटा सोने के बाद हम लोग फ़िर नंगे ही बाथरूम में गए ..तब सुबह के चार बज रहे थे..बाथरूम में साफ होने के बाद वापस आके मैंने भाभी को नंगी ही पकड़ के .बहुत ...चूमा .. मम्मे दबाये..फ़िर वो अपने कपड़े पहन कर बेड रूम में रमेश के पास चली गई..

अब तो मै भाभी को बहुत चोदता हू हपते में तीन चार रात तो भाभी मेरे ही बिस्तर पर रात गुजारती है, और चुदाई का पूरा मज़ा लेती है.. शायद इस बार भाभी गर्भवती है कह रही थी मासिक नही हुआ अभी तक...ये बच्चा मेरा ही है..